संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७७
**मुनि बोले—**व्यासजी! हम परम कल्याणमय ब्रह्मपारस्तोत्रको श्रवण करना चाहते हैं, जिसका जप करते हुए कण्डुमुनिने भगवान् विष्णुकी आराधना की थी।
**व्यासजीने कहा—**भगवान् विष्णु सबके परम पार (अन्तिम प्राप्य) हैं; वे अपार भवसागरसे पार उतारनेवाले, पर-शब्द-वाच्य, आकाश आदि पञ्च महाभूतोंसे परे और परमात्मस्वरूप हैं। वेदोंकी भी पहुँचसे परे होनेके कारण उन्हें ब्रह्मपार कहते हैं। वे दूसरोंके लिये पारस्वरूप हैं—उन्हें पाकर सब प्राणी सदाके लिये पार हो जाते हैं। वे परके भी पर—इन्द्रिय, मन आदिके भी अगोचर हैं। सबके पालक और सबकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। वे कारणमें स्थित होते हुए भी स्वयं ही कारणरूप हैं। कारणके भी कारण हैं। परम कारणभूत प्रकृतिके कारण भी वे ही हैं। कार्योंमें भी उन्हींकी स्थिति है। इस प्रकार कर्म और कर्ता आदि अनेक रूप धारण करके वे सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा करते हैं। ब्रह्म ही प्रभु है, ब्रह्म ही सर्वस्वरूप है, ब्रह्म ही प्रजापति तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाला है। वह ब्रह्म अविनाशी, नित्य और अजन्मा है। वही क्षय आदि सम्पूर्ण विकारोंके सम्पर्कसे रहित भगवान् विष्णु है। वे भगवान् पुरुषोत्तम ही अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य ब्रह्म हैं। उनके प्रभावसे मेरे राग आदि समस्त दोष नष्ट हो जायँ।
मुनिके उस ब्रह्मपारस्तोत्रका जप सुनकर और उनकी सुदृढ़ पराभक्तिको जानकर भक्तवत्सल भगवान् पुरुषोत्तम बड़े प्रसन्न हुए और उनके पास जाकर बोले—'मुने! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। सुव्रत! तुम कोई वर माँगो।' देवाधिदेव भगवान् चक्रपाणिके ये वचन सुनकर मुनिने सहसा आँखें खोल दीं और देखा, भगवान् सामने खड़े हैं। उनका श्रीअङ्ग तीसीके फूलकी भाँति श्याम है। नेत्र पद्मपत्रके समान विशाल हैं। हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा शोभा पाते हैं। माथेपर मुकुट और भुजाओंमें भुजबन्ध सुशोभित हैं। चार भुजाएँ हैं। अङ्ग-अङ्गसे उदारता टपकती है। सुन्दर शरीरपर पीताम्बर शोभा दे रहा है। श्रीवत्स-चिह्नसे युक्त वक्षःस्थल वनमालासे विभूषित है। श्रीहरि समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त दिखायी देते हैं। उनके अङ्गोंमें सब प्रकारके रत्नमय आभूषण शोभा पाते हैं। श्रीअङ्गमें दिव्य चन्दन लगा है और दिव्य हार उनकी शोभा बढ़ा रहा है।* इस प्रकार भगवान्की झाँकी देखकर
* अतसीपुष्पसंकाशं पद्मपत्रायतेक्षणम्। शङ्खचक्रगदापाणिं मुकुटाङ्गदधारिणम्॥
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं पीतवस्त्रधरं शुभम्। श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तं वनमालाविभूषितम्॥
सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वरत्नविभूषितम्। दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गं दिव्यमाल्यविभूषितम्॥
(१७८। १२४—१२६)