भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

२७८

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

कण्डुमुनिके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा—'आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरी तपस्याका फल मिल गया।' यों कहकर मुनिने भगवान्‌की स्तुति आरम्भ की।

कण्डु बोले— नारायण! हरे! श्रीकृष्ण! श्रीवत्साङ्क! जगत्पते! जगद्बीज! जगद्धाम! जगत्साक्षिन्! आपको नमस्कार है। अव्यक्त विष्णो! आप ही सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। प्रकृति और पुरुष दोनोंसे उत्तम होनेके कारण आपको पुरुषोत्तम कहते हैं। कमलनयन गोविन्द! जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। आप हिरण्यगर्भ, लक्ष्मीपति, पद्मनाभ और सनातन पुरुष हैं। यह पृथ्वी आपके गर्भमें है। आप ध्रुव और ईश्वर हैं। हृषीकेश! आपको नमस्कार है। आप अनादि, अनन्त और अजेय हैं। विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ! आपकी जय हो। श्रीकृष्ण! आप अजित और अखण्ड हैं। श्रीनिवास! आपको नमस्कार है। आप ही बादल और धूम—वर्षा और गर्मी करनेवाले हैं। आपका पार पाना कठिन है। आप बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होते हैं। दुःख और पीड़ाओंका नाश करनेवाले हरे! जलमें शयन करनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। अव्यक्त परमेश्वर! आप सम्पूर्ण भूतोंके पालक और ईश्वर हैं। भौतिक तत्त्वोंसे आप कभी क्षुब्ध होनेवाले नहीं हैं। सम्पूर्ण प्राणी आपमें ही निवास करते हैं। आप सब भूतोंके आत्मा हैं। सम्पूर्ण भूत आपके गर्भमें स्थित हैं। आपको नमस्कार है। आप यज्ञ, यज्वा, यज्ञधर, यज्ञधाता और अभय देनेवाले हैं। यज्ञ आपके गर्भमें स्थित है। आपका श्रीअङ्ग सुवर्णके समान कान्तिमान् है। पृश्निगर्भ! आपको नमस्कार है। आप क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपालक, क्षेत्री, क्षेत्रहन्ता, क्षेत्रकर्ता, जितेन्द्रिय, क्षेत्रात्मा, क्षेत्ररहित और क्षेत्रके स्रष्टा हैं। आपको नमस्कार है। गुणालय, गुणावास, गुणाश्रय, गुणावह, गुणभोक्ता, गुणाराम और गुणत्यागी—ये सब आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है। आप ही श्रीविष्णु हैं। आप ही श्रीहरि और चक्री कहलाते हैं। आप ही श्रीविष्णु और आप ही जनार्दन हैं। आप ही वषट्कार कहे गये हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानके प्रभु भी आप ही हैं। आप भूतोंके उत्पादक और अव्यक्त हैं। सबकी उत्पत्तिके कारण होनेसे आप 'भव' कहलाते हैं। आप सम्पूर्ण प्राणियोंके भरण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही भूतभावन देवता हैं। आपको अजन्मा और ईश्वर कहते हैं।

आप विश्वकर्मा हैं, श्रीविष्णु हैं, शम्भु हैं और वृषभकी आकृति धारण करनेवाले हैं। आप ही शंकर, आप ही शुक्राचार्य, आप ही सत्य, आप ही तप और आप ही जनलोक हैं। आप विश्वविजेता, कल्याणमय, शरणागतपालक, अविनाशी, शम्भु, स्वयम्भू, ज्येष्ठ और परायण (परम आश्रय) हैं। आदित्य, ओंकार, प्राण, अन्धकारनाशक सूर्य,