भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281
  • कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७१

मेघ, सर्वत्र विख्यात तथा देवताओंके स्वामी ब्रह्मा भी आप ही हैं। ऋक्, यजुः और साम भी आप ही हैं। आप ही सबके आत्मा माने गये हैं। आप ही अग्नि, आप ही वायु, आप ही जल और आप ही पृथ्वी हैं। स्रष्टा, भोक्ता, होता, हविष्य,यज्ञ, प्रभु, विभु, श्रेष्ठ, लोकपति और अच्युत भी आप ही हैं। आप सबके द्रष्टा और लक्ष्मीवान् हैं। आप ही सबका दमन करनेवाले और शत्रुओंके नाशक हैं। आप ही दिन और आप ही रात्रि हैं, विद्वान् पुरुष आपको ही वर्ष कहते हैं। आप ही काल हैं। कला, काष्ठा, मुहूर्त्त, क्षण और लव—सब आपके ही स्वरूप हैं। आप ही बालक, आप ही वृद्ध तथा आप ही पुरुष, स्त्री और नपुंसक हैं। आप विश्वकी उत्पत्तिके स्थान हैं। आप ही सबके नेत्र हैं। आप ही स्थाणु (स्थिर रहनेवाले) और आप ही शुचिश्रवा (पवित्र यशवाले) हैं। आप सनातन पुरुष हैं। आपको कोई जीत नहीं सकता। आप इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्र और सबसे उत्तम हैं। आप सम्पूर्ण विश्वको सुख देनेवाले हैं। वेदोंके अङ्ग भी आप ही हैं। आप अविनाशी, वेदोंके भी वेद (ज्ञेय तत्त्व), धाता, विधाता और समाहित रहनेवाले हैं। आप जलराशि समुद्र हैं। आप ही उसके मूल हैं। आप ही धाता और आप ही वसु हैं। आप वैद्य, आप धृतात्मा और आप इन्द्रियातीत हैं। आप सबसे आगे चलनेवाले और गाँवके नेता हैं। आप ही गरुड़ और आप ही आदिमान् हैं। आप ही संग्रह (लघु) और आप ही परम महान् हैं। अपने मनको वशमें रखनेवाले और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भी आप ही हैं। आप यम और नियम हैं। आप प्रांशु (उन्नत शरीरवाले) और चतुर्भुज हैं। अन्न, अन्तरात्मा और परमात्मा भी आप ही कहलाते हैं। आप गुरु और गुरुतम हैं, वाम और दक्षिण हैं। आप ही पीपल एवं अन्य वृक्ष हैं। व्यक्त जगत् और प्रजापति भी आप ही हैं। आपकी नाभिसे सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ है। आप दिव्य शक्तिसे सम्पन्न हैं। आप ही चन्द्रमा और आप ही प्रजापति हैं। आपके स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। आप ही यम और आप ही दैत्योंके नाशक श्रीविष्णु हैं। आप ही संकर्षण देव हैं। आप ही कर्ता और आप ही सनातन पुरुष हैं। आप तीनों गुणोंसे रहित हैं।

आप ज्येष्ठ, वरिष्ठ और सहिष्णु हैं। लक्ष्मीके पति हैं। आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप अव्यक्त देवता हैं। आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। आप विराट् और देवताओंके स्वामी हैं। देवदेव! तथापि आप दस अंगुलके होकर रहते हैं। जो भूत है, वह आपका ही स्वरूप बताया गया है। आप ही अन्तर्यामी पुरुष, इन्द्र और उत्तम देवता हैं। जो भविष्य है, वह भी आप ही हैं। आप ही ईशान, आप ही अमृत और आप ही मर्त्य हैं। यह सम्पूर्ण संसार आपसे ही अङ्कुरित होता है, अतः आप परम महान् और सबसे उत्तम हैं। देव! आप सबसे ज्येष्ठ हैं, पुरुष हैं और आप ही दस प्राणवायुओंके रूपमें स्थित हैं। आप विश्वरूप होकर चार भागोंमें स्थित हैं। अमृतस्वरूप होकर नौ भागोंके साथ द्युलोकमें रहते हैं और नौ भागोंसहित सनातन पौरुषेय रूप धारण करके अन्तरिक्षमें निवास करते हैं। आपके दो भाग पृथ्वीमें स्थित हैं और चार भाग भी यहाँ हैं। आपसे यज्ञोंकी उत्पत्ति होती है, जो जगत्में वृष्टि करनेवाले हैं। आपसे ही विराट्की उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण जगत्के हृदयमें अन्तर्यामी पुरुषरूपसे विराजमान हैं। वह विराट् पुरुष अपने तेज, यश और ऐश्वर्यके कारण सम्पूर्ण भूतोंसे विशिष्ट है। आपसे ही देवताओंका आहारभूत हवनीय घृत