भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


उत्पन्न हुआ। ग्राम्य और जंगली ओषधियाँ तथा पशु एवं मृग आदि भी आपसे ही प्रकट हुए हैं। देवदेव! आप ध्येय और ध्यानसे परे हैं। आपने ही ओषधियोंको उत्पन्न किया है। आप ही सात मुखोंवाले देदीप्यमान विग्रहसे युक्त काल हैं। यह स्थावर और जङ्गम तथा चर और अचर सम्पूर्ण जगत् आपसे ही प्रकट हुआ है और आपमें ही स्थित है। आप अनिरुद्ध, वासुदेव, प्रद्युम्न तथा दैत्यनाशक संकर्षण हैं। देव! आप सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ और समस्त विश्वके परम आश्रय हैं। कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिये। नारायण! आपको नमस्कार है। भगवन्! विष्णो! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। सर्वलोकेश्वर! आपको नमस्कार है। कमलालय! आपको नमस्कार है। गुणालय! आपको नमस्कार है। गुणाकर! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। सुरोत्तम! आपको नमस्कार है। जनार्दन! आपको नमस्कार है। सनातन! आपको नमस्कार है।

योगिगम्य परमेश्वर! आपको नमस्कार है। योगके आश्रयस्थान! आपको नमस्कार है। गोपते! श्रीपते! मरुत्पते! श्रीविष्णो! आपको नमस्कार है। जगत्पते! आप जगत्को उत्पन्न करनेवाले और ज्ञानियोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। दिवस्पते! आपको नमस्कार है। महीपते! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप मधु दैत्यका वध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। कैटभको मारनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। पीठपर वेदोंको धारण करनेवाले महामत्स्यरूप अच्युत! आपको नमस्कार है। आप समुद्रके जलको मथ डालनेवाले और लक्ष्मीको आनन्द देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। विशाल नासिकावाले अश्वमुख भगवान् हयग्रीव! महापुरुषविग्रह! आप मधु और कैटभका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप पृथ्वीको ऊपर उठानेके लिये विशाल कच्छपका शरीर धारण करनेवाले हैं, आपने अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण किया था। महाकूर्मस्वरूप आप भगवान्को नमस्कार है। पृथ्वीका उद्धार करनेवाले महावराहको नमस्कार है। भगवन्! आपने ही पहले-पहल वराहरूप धारण किया था, अतः आप आदिवराह कहलाते हैं। आप विश्वरूप और विधाता हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्त, सूक्ष्म, मुख्य, श्रेष्ठ, परमाणुस्वरूप तथा योगिगम्य हैं। आपको नमस्कार है। जो परम कारण (प्रकृति)-के भी कारण हैं, योगीश्वर-मण्डलके आश्रयस्थान हैं, जिनके स्वरूपका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है, जो क्षीरसागरके भीतर निवास करनेवाले महान् सर्प—शेषनागकी सुन्दर शय्यापर शयन करते हैं तथा जिनके कानोंमें सुवर्ण एवं रत्नोंके बने हुए दिव्य कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, उन आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है।

कण्डुमुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! तुम मुझसे जो कुछ पाना चाहते हो, उसे शीघ्र कहो।'

कण्डु बोले—जगन्नाथ! यह संसार अत्यन्त दुस्तर और रोमाञ्चकारी है। इसमें दुःखोंकी ही अधिकता है। यह अनित्य और केलेके पत्तेकी भाँति सारहीन है। इसमें न कहीं आश्रय है, न अवलम्ब। यह जलके बुलबुलोंकी भाँति चञ्चल है। इसमें सब प्रकारके उपद्रव भरे हुए हैं। यह दुस्तर होनेके साथ ही अत्यन्त भयानक है। मैं आपकी मायासे मोहित होकर चिरकालसे इस संसारमें भटक रहा हूँ, किंतु कहीं भी शान्ति नहीं पाता। मेरा मन विषयोंमें आसक्त है। देवेश! इस संसारके भयसे पीड़ित होकर आज मैं आपकी

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