संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* मुनियोंका भगवान्के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर * २८१
शरणमें आया हूँ। श्रीकृष्ण ! आप इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। सुरेश्वर ! मैं आपकी कृपासे आपके ही सनातन परम पदको प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ जानेसे फिर इस संसारमें नहीं आना पड़ता।
श्रीभगवान् बोले— मुनिश्रेष्ठ ! तुम मेरे भक्त हो। सदा मेरी ही आराधना करते रहो। तुम्हें मेरे प्रसादसे अभीष्ट मोक्षपदकी प्राप्ति होगी। विप्रवर ! मेरे भक्त क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र तथा अन्त्यज भी परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं; फिर तुम-जैसे तपोनिष्ठ ब्राह्मणकी तो बात ही क्या है ! चाण्डाल भी यदि उत्तम श्रद्धासे युक्त एवं मेरा भक्त हो तो उसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है; फिर औरोंकी तो चर्चा ही क्या है।*
व्यासजी कहते हैं— यों कहकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर मुनिवर कण्डु बहुत प्रसन्न हुए और समस्त कामनाओंका त्याग करके स्वस्थचित्त हो गये। समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके ममता और अहंकारसे रहित हो एकाग्रचित्तसे भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करने लगे। भगवान्के निर्लेप, निर्गुण, शान्त और सन्मात्र स्वरूपका चिन्तन करते हुए उन्होंने दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया। जो महात्मा कण्डुकी कथाको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें जाता है। मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने इस कर्मभूमि तथा मोक्षदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन किया, जहाँ साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। जो मनुष्य संसारजनित दुःखोंका नाश और मोक्ष प्रदान करनेवाले वरदायक भगवान् श्रीपुरुषोत्तमका भक्तिपूर्वक दर्शन, स्तवन और ध्यान करते हैं, वे समस्त दोषोंसे मुक्त हो भगवान्के अविनाशी धाममें जाते हैं।
मुनियोंका भगवान्के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर
मुनि बोले— पुरुषश्रेष्ठ व्यासजी ! आपने भारतवर्ष तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके अद्भुत गुणोंका वर्णन किया। उस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको सुनकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हमारे मनमें बहुत दिनोंसे एक संदेह है। उसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। हम भूतलपर श्रीकृष्ण, बलदेव और सुभद्राके अवतारका रहस्य सुनना चाहते हैं। वीरवर श्रीकृष्ण और बलभद्र किसलिये अवतीर्ण हुए थे ? वे वसुदेवके पुत्र होकर नन्दके घरमें क्यों रहे ? यह मर्त्यलोक सर्वथा निःसार है। इसमें अधिकतर दुःख ही भरा है। यह पानीके बुलबुलेकी भाँति अत्यन्त चञ्चल—क्षणभङ्गुर है। इसकी भयंकरता इतनी बढ़ी हुई है कि उसका विचार आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसे संसारमें उन्हें जन्म ग्रहण करनेकी क्या आवश्यकता थी ? इस भूतलपर अवतीर्ण हो उन्होंने जो-जो लीलाएँ कीं, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उनका सम्पूर्ण चरित्र अद्भुत और अलौकिक है। भगवान् सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी एवं सुरश्रेष्ठ हैं और पृथ्वीको उत्पन्न करनेवाले तथा अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने अपने दिव्य स्वरूपको मनुष्योंके बीचमें कैसे प्रकट किया ? जो भगवान् सम्पूर्ण जङ्गम
* मद्भक्ताः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रान्त्यजातिजाः। प्राप्नुवन्ति परां सिद्धिं किं पुनस्त्वं द्विजोत्तम॥
श्वपाकोऽपि च मद्भक्तः सम्यक् श्रद्धासमन्वितः। प्राप्नोत्यभिमतं सिद्धिमन्येषां तत्र का कथा॥ (१७८।१८५-१८६)