भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

प्राणियोंकी गति हैं, वे मानव-शरीरमें कैसे आये? इसे देवता और दैत्य भी बड़े आश्चर्यकी बात मानते हैं। महामुने! आप भगवान् विष्णुके आश्चर्यजनक अवतारकी कथा सुनाइये। भगवान्के बल और पराक्रम विख्यात हैं। उनके तेजकी कोई माप नहीं है। वे अपने अलौकिक चरित्रोंके द्वारा आश्चर्यरूप जान पड़ते हैं। आप उनके तत्त्वका वर्णन कीजिये। भगवान् पुरुषोत्तम देवताओंकी पीड़ा दूर करनेवाले और सर्वव्यापी हैं। जगत्के रक्षक और सर्वलोकमहेश्वर हैं। संसारकी सृष्टि, पालन और संहार—सब वे ही करते हैं। वे ही सब लोकोंको सुख देनेवाले हैं। वे अक्षय, सनातन, अनन्त, क्षय और वृद्धिसे रहित, निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, निर्विकार, निरञ्जन, समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्ररूपसे स्थित, अविकारी, विभु, नित्य, अचल, निर्मल, व्यापक, नित्यतृप्त, निरामय तथा शाश्वत परमात्मा हैं। सत्ययुगमें उनका विशुद्ध ‘हरि’ नाम सुना जाता है। देवताओंमें वे वैकुण्ठ और मनुष्योंमें श्रीकृष्ण नामसे विख्यात हैं। उन्हीं परमेश्वरकी भूत और भविष्य लीलाओंको, जिनका रहस्य अत्यन्त गहन है, हम सुनना चाहते हैं।

**व्यासजी बोले—**जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुराणपुरुष, सनातन, अविनाशी, चतुर्व्यूहस्वरूप, निर्गुण, गुणरूप, परम महान्, परम गुरु, वरेण्य, असीम, यज्ञाङ्ग और देवता आदिके प्रियतम हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनसे लघु और जिनसे महान् दूसरा कोई नहीं है, जिन अजन्मा प्रभुने सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्यास कर रखा है, जो आविर्भाव, तिरोभाव, दृष्ट और अदृष्टसे विलक्षण हैं, सृष्टि और संहारको भी जिनका स्वरूप बतलाया जाता है, उन आदिदेव परब्रह्म परमात्माको मैं समाधिके द्वारा प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण विकारोंसे रहित, शुद्ध, नित्य, सदा एकरूप रहनेवाले और विजयी हैं, उन परमात्मा श्रीविष्णुको नमस्कार है। जो हिरण्यगर्भ, हरि, शंकर तथा वासुदेव कहलाते हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंका तरण-तारण होता है, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। जो एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, स्थूल और सूक्ष्म, व्यक्त और अव्यक्त जिनके स्वरूप हैं और जो मोक्षके कारण हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो जगन्मय हैं, जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके मूल कारण हैं, उन परमात्मा, भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, सम्पूर्ण विश्वके आधारभूत, समस्त प्राणियोंके भीतर विराजमान और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम है। जो वास्तवमें अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप होते हुए भी भ्रमपूर्ण दृष्टिके कारण भिन्न-भिन्न पदार्थोंके रूपमें स्थित दिखायी देते हैं, जिनका आदि नहीं है, जो सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, अजन्मा, अक्षय और अविनाशी हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करके मैं उनके अवतारकी कथा आरम्भ करता हूँ।

पूर्वकालमें दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियोंके पूछनेपर कमलयोनि भगवान् ब्रह्माने जो कुछ कहा था, वही मैं भी आपलोगोंसे कहूँगा। जो अपने चारों मुखोंसे ऋक्, साम आदि चारों वेदोंका उच्चारण करते हुए तीनों लोकोंको पवित्र करते हैं, जिनका प्रादुर्भाव एकार्णवके जलसे हुआ है, असुरगण जिनके यज्ञोंका लोप नहीं कर पाते, उन भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम करके मैं उन्हींकी कही हुई कथा आरम्भ करता हूँ। जिन्होंने सृष्टिके उद्देश्यसे धर्म आदिको प्रकट किया है, उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके सम्पूर्ण मतका ही मैं वर्णन करूँगा।