संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- मुनियोंका भगवान्के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर * २८३
तत्त्वदर्शी मुनियोंने जलको 'नार' कहा है। वह नार पूर्वकालमें भगवान्का अयन (निवासस्थान) हुआ। इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। वे भगवान् नारायण सबको व्यास करके स्थित हैं। वे ही सगुण और निर्गुण कहलाते हैं। वे दूर भी हैं और समीप भी। उनकी 'वासुदेव' संज्ञा है। ममताका त्याग करनेपर ही उनका साक्षात्कार होता है। उनमें रूप और वर्ण आदि काल्पनिक भाव नहीं हैं। वे सदा शुद्ध, सुप्रतिष्ठित और एकरूप हैं। जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब वे अपने-आपको संसारमें प्रकट करते हैं। पूर्वकालमें उन्हीं प्रजापालक भगवान्ने वाराहरूप धारण करके थूथनसे जलको हटाया और रसातलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपनी एक दाढ़से कमलके फूलकी भाँति ऊपर उठा लिया। उन्होंने ही नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया और विप्रचित्ति आदि अन्य दानवोंको भी मार गिराया। फिर वामन अवतार लेकर मायासे बलिको बाँधा और दैत्योंको जीतकर तीनों लोकोंको अपने तीन पगोंसे ही नाप लिया। वे ही भृगु-वंशमें परमप्रतापी जमदग्निकुमार परशुरामके रूपमें उत्पन्न हुए, जिन्होंने पिताके वधका बदला लेनेके लिये क्षत्रियोंका संहार कर डाला। उन्हीं भगवान्ने अत्रिकुमार प्रतापी दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हो महात्मा अलर्कको अष्टाङ्गयोगका उपदेश दिया। त्रेतामें दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें प्रकट होकर उन्होंने ही त्रिभुवनको भय देनेवाले रावणका युद्धमें संहार किया।
प्रलयकालमें जब सारी सृष्टि एकार्णवमें निमग्न हो गयी, उस समय देवताओंके भी देवता जगत्पति श्रीविष्णु एक सहस्र युगोंतक शेषनागकी शय्यापर सोते रहे। वास्तवमें वे योगनिद्राका आश्रय ले अपनी योगमहिमामें स्थित हो गये थे। सम्पूर्ण चराचर जगत्को उन्होंने अपने उदरमें स्थापित कर रखा था। जनलोकनिवासी सिद्ध और महर्षि उनकी स्तुति करते थे। उसी समय उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ, जो दिशारूपी पत्रोंसे सुशोभित, अग्नि और सूर्यके समान तेजोमय और पर्वतरूपी केसरोंसे अलंकृत था। सुवर्णमय मेरुगिरि उसका किञ्जल्क (केसरका मध्यभाग) था। वह कमल ही पितामह ब्रह्माजीका सुन्दर गृह था। उसीमें चार मुखोंवाले देवाधिदेव ब्रह्माजी प्रकट हुए। उस समय भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे दो महाबली और महापराक्रमी दानव उत्पन्न हुए, जो ब्रह्माजीको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उनका नाम मधु और कैटभ था। भगवान्ने समुद्ररूपी शयनगृहसे उठकर उन दोनों दुर्धर्ष दैत्योंका वध किया। ये तथा और भी भगवान्की असंख्य लीलाएँ हैं, जिनकी मैं गणना नहीं कर सकता। इस समय अजन्मा भगवान्के जिस अवतारका प्रसङ्ग चल रहा है, वह मथुरामें हुआ था। इस प्रकार भगवान्की जो सात्त्विक मूर्ति है, वही अवतार धारण करती है। वह प्रद्युम्न नामसे विख्यात है और सदा रक्षाकार्यमें संलग्न रहती है। वह भगवान् वासुदेवकी इच्छाके अनुसार देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिमें अवतीर्ण होती है और उसीके अनुकूल स्वभाव बना लेती है। भक्त पुरुषोंद्वारा पूजित होनेपर वह उनकी मनोवाञ्छित कामनाओंको भी पूर्ण करती है। इस तरह मैंने यहाँ भगवान्के अवतारका रहस्य बतलाया है। भगवान् विष्णु यद्यपि कृतकृत्य हैं, उन्हें कुछ करना अथवा पाना नहीं है तो भी वे लोक-कल्याणके लिये ही मानवरूपमें प्रकट हुए थे।