संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * भगवान्के अवतारका उपक्रम * | २८५ |
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ब्रह्माजी बोले— सहस्रमूर्ते ! आपको बारंबार नमस्कार है। आपके सहस्रों बाँहें, अनेक मुख और अनेक चरण हैं। आप जगत्की सृष्टि, पालन और संहारमें संलग्न रहते हैं। अप्रमेय परमेश्वर ! आपको बारंबार नमस्कार है। भगवन् ! आप सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, परम महान् और बड़े-बड़े गुरुओंसे भी अधिक गौरवशाली हैं। आप प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार तथा वाणीके भी प्रधान मूल हैं। अपरा-प्रकृतिमय सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। आप हमपर प्रसन्न होइये। देव ! यह पृथ्वी आपकी शरणमें आयी है। इस समय भूतलपर जो बड़े-बड़े असुर उत्पन्न हुए हैं, उनके द्वारा पीड़ित होनेसे इसके पर्वतरूपी बन्धन शिथिल पड़ गये हैं। आप सम्पूर्ण जगत्के परम आश्रय हैं। आपकी महिमा अपरम्पार है। अतः यह वसुधा अपना भार उतरवानेके लिये आपकी ही सेवामें उपस्थित हुई है। हमलोग भी यहाँ उपस्थित हुए हैं। ये इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, वरुण, रुद्र, वसु, आदित्य, वायु, अग्नि तथा अन्य सम्पूर्ण देवता यहाँ खड़े हैं। देवेश्वर ! मुझे तथा इन देवताओंको जो कुछ करना हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये। आपके ही आदेशका पालन करते हुए हमलोग सदा सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त रहेंगे।
ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर परमेश्वर भगवान् श्रीविष्णुने अपने श्वेत और कृष्ण—दो केश उखाड़े और देवताओंसे कहा—'मेरे ये दोनों केश ही भूतलपर अवतार ले पृथ्वीके भार और क्लेशका नाश करेंगे। सम्पूर्ण देवता भी अपने-अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हो पहलेसे उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्योंके साथ युद्ध करें। इसमें संदेह नहीं कि नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे चूर्ण होकर सम्पूर्ण दैत्य नष्ट हो जायँगे। वसुदेवकी पत्नी जो देवकीदेवी हैं, उनके आठवें गर्भसे मेरा यह श्याम केश प्रकट होगा। भूतलपर अवतीर्ण हो यह कालनेमिके अंशसे उत्पन्न हुए कंसका वध करेगा।' यों कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। अदृश्य हो जानेपर उन परमात्माको प्रणाम करके सम्पूर्ण देवता मेरुपर्वतके शिखरपर चले गये और वहाँसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए।
एक दिन महर्षि नारदने कंससे जाकर कहा—'देवकीके आठवें गर्भसे भगवान् विष्णु उत्पन्न होंगे, जो तुम्हारा वध करेंगे।' यह सुनकर कंसको बड़ा क्रोध हुआ और उसने देवकी तथा वसुदेवको कारागृहमें बंदी बना लिया। वसुदेवने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'देवकीके गर्भसे जो-जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसे मैं स्वयं लाकर दे दिया करूँगा।' इसके अनुसार उन्होंने अपना प्रत्येक पुत्र कंसको अर्पित कर दिया। सुना गया है प्रथम उत्पन्न हुए छः गर्भ हिरण्यकशिपुके पुत्र थे, जिन्हें भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे योगनिद्राने क्रमशः देवकीके उदरमें स्थापित कर दिया था। योगनिद्रा भगवान् विष्णुकी महामाया है, जिसने अविद्यारूपसे सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है। उससे श्रीहरिने कहा—'निद्रे ! तू मेरी आज्ञासे जा और पातालवासी छः गर्भोको एक-एक करके देवकीके गर्भमें पहुँचा दे। ये सब कंसके हाथसे मारे जायँगे। तत्पश्चात् मेरा शेष नामक अंश अपने अंशांशसे देवकीके उदरमें सातवें गर्भके रूपमें प्रकट होगा। वसुदेवजीकी दूसरी भार्या रोहिणी आजकल गोकुलमें रहती हैं। तू प्रसवकालमें वह गर्भ रोहिणीके ही उदरमें डाल देना। उसके विषयमें लोग यही कहेंगे कि 'देवकीका सातवाँ गर्भ भोजराज कंसके डरसे गिर गया।' गर्भका संकर्षण होनेसे रोहिणीका वह वीर पुत्र लोकमें 'संकर्षण' नामसे विख्यात होगा। उसके शरीरका वर्ण श्वेतगिरिके शिखरकी भाँति