संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
गौर होगा। तदनन्तर मैं देवकीके उदरमें प्रवेश करूँगा। उस समय तुझे भी यशोदाके गर्भमें अविलम्ब प्रवेश करना होगा। वर्षा-ऋतुमें श्रावणमासके* कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको आधी रातके समय मेरा प्रादुर्भाव होगा और तू नवमी तिथिमें यशोदाके गर्भसे जन्म लेगी। उस समय वसुदेव मेरी शक्तिसे प्रेरित होकर मुझे तो यशोदाकी शय्यापर पहुँचा देंगे और तुझे देवकीके पास लायेंगे। फिर कंस तुझे लेकर पत्थरकी शिलापर पछाड़ेगा, किंतु तू उसके हाथसे निकलकर आकाशमें ठहर जायगी। यों करनेपर इन्द्र मेरे गौरवका स्मरण करके तुझे सौ-सौ बार प्रणाम करेंगे और विनीतभावसे अपनी बहिन बना लेंगे। फिर तू शुम्भ-निशुम्भ आदि सहस्रों दैत्योंका वध करके अनेक स्थान बनाकर सारी पृथ्वीकी शोभा बढ़ायेगी। भूति, संतति, कीर्ति, कान्ति, पृथ्वी, धृति, लज्जा, पुष्टि, उषा तथा अन्य जो भी स्त्री-नामधारी वस्तु है, वह सब तू ही है। जो प्रातःकाल और अपराह्नमें तेरे सामने मस्तक झुकायेंगे और तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेम्या तथा क्षेमंकरी आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे, उनके समस्त मनोरथ मेरे प्रसादसे सिद्ध हो जायँगे। जो लोग भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थसे तेरी पूजा करेंगे, उन मनुष्योंपर प्रसन्न होकर तू उनकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करेगी। वे सब लोग सदा मेरी कृपासे निश्चय ही कल्याणके भागी होंगे; अतः देवि! जो कार्य मैंने तुझे बताया है, उसे पूर्ण करनेके लिये जा।'
भगवान्का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध, शकट-भञ्जन, यमलार्जुन-उद्धार, गोपोंका वृन्दावनगमन तथा बलराम और श्रीकृष्णका बछड़े चराना
**व्यासजी कहते हैं—**देवाधिदेव श्रीहरिने पहले जैसा आदेश दिया था, उसके अनुसार जगज्जननी योगमायाने देवकीके उदरमें क्रमशः छः गर्भ स्थापित किये और सातवेंको खींचकर रोहिणीके उदरमें डाल दिया। तदनन्तर तीनों लोकोंका उपकार करनेके लिये साक्षात् श्रीहरिने देवकीके गर्भमें प्रवेश किया और उसी दिन योगनिद्रा यशोदाके उदरमें प्रविष्ट हुईं। भगवान् विष्णुके अंशके भूतलपर आते ही आकाशमें ग्रहोंकी गति यथावत् होने लगी। समस्त ऋतुएँ सुखदायिनी हो गयीं। देवकीके शरीरमें इतना तेज आ गया कि कोई उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था। देवतागण स्त्री-पुरुषोंसे अदृश्य रहकर अपने उदरमें श्रीविष्णुको धारण करनेवाली माता देवकीका प्रतिदिन स्तवन करने लगे।
**देवता बोले—**देवि! तुम स्वाहा, तुम स्वधा और तुम्हीं विद्या, सुधा एवं ज्योति हो। इस पृथ्वीपर सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये तुम्हारा अवतार हुआ है। तुम प्रसन्न होकर सम्पूर्ण जगत्का कल्याण करो। हमारी प्रसन्नताके लिये उन परमेश्वरको अपने गर्भमें धारण करो, जिन्होंने स्वयं सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रखा है।
* यहाँ श्रावणका अर्थ भाद्रपद समझना चाहिये। जहाँ अमावस्याके बाद शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माना जाता है, वहाँकी मास-गणनाको दृष्टिमें रखकर श्रावण मास कहा गया है। जहाँ कृष्णपक्षसे मासका आरम्भ होता है, वहाँ वह तिथि भाद्रपद मासमें ही होगी।