संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भगवान्का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध और श्रीकृष्णका बछड़े चराना * २८७
इस प्रकार देवताओंद्वारा की हुई स्तुतिको सुनती हुई माता देवकीने जगत्की रक्षा करनेवाले कमलनयन भगवान् विष्णुको अपने गर्भमें धारण किया। तदनन्तर वह शुभ समय उपस्थित हुआ, जब कि समस्त विश्वरूपी कमलको विकसित करनेके लिये महात्मा श्रीविष्णुरूपी सूर्यदेवका देवकीरूपी प्रभातवेलामें उदय हुआ। आधी रातका समय था। मेघ मन्द-मन्द स्वरमें गरज रहे थे। शुभ मुहूर्तमें भगवान् जनार्दन प्रकट हुए। उस समय सम्पूर्ण देवता फूलोंकी वर्षा करने लगे। विकसित नील कमलके समान श्यामवर्ण, श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित वक्षःस्थलवाले चतुर्भुज बालकको उत्पन्न हुआ देख परम बुद्धिमान् वसुदेवजीने उल्लासपूर्ण वचनोंमें भगवान्का स्तवन किया और कंससे भयभीत होकर कहा—'शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर! मैंने जान लिया, आप साक्षात् भगवान् हैं; परंतु देव! आप मुझपर कृपा करके अपने इस दिव्य रूपको छिपा लीजिये। आप मेरे भवनमें अवतीर्ण हुए हैं, यह बात जान लेनेपर कंस अभी मुझे कष्ट देगा।'
देवकी बोलीं—जिनके अनन्त रूप हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका ही स्वरूप है, जो गर्भमें स्थित होकर भी अपने शरीरसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बाल-रूप धारण किया है, वे देवदेव प्रसन्न हों। सर्वात्मन्! आप अपने इस चतुर्भुज रूपका उपसंहार कीजिये। दैत्योंका संहार करनेवाले देवेश्वर! आपके इस अवतारका वृत्तान्त कंस न जानने पाये।
श्रीभगवान् बोले—देवि! पूर्वजन्ममें तुमने मुझ-जैसे पुत्रको पानेकी अभिलाषासे जो मेरा स्तवन किया था, वह आज सफल हो गया; क्योंकि आज मैंने तुम्हारे उदरसे जन्म लिया है।
मुनिवरो! यों कहकर भगवान् मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी रातमें ही उन्हें लेकर घरसे बाहर निकले। वसुदेवजीके जाते समय पहरा देनेवाले मथुराके द्वारपाल योगनिद्राके प्रभावसे अचेत हो गये थे। उस रातमें बादल वर्षा कर रहे थे। यह देख शेषनागने छत्रकी भाँति अपने फणोंसे भगवान्को ढँक लिया और वे वसुदेवजीके पीछे-पीछे चलने लगे। मार्गमें अत्यन्त गहरी यमुना बह रही थीं। उनके जलमें नाना प्रकारकी सैकड़ों लहरें उठ रही थीं, किंतु भगवान् विष्णुको ले जाते समय वे वसुदेवजीके घुटनोंतक होकर बहने लगीं। वसुदेवजीने उसी अवस्थामें यमुनाको पार किया। उन्होंने देखा—नन्द आदि बड़े-बूढ़े गोप राजा कंसका कर लेकर यमुनाके तटपर आये हुए हैं। इसी समय यशोदाजीने भी योगमायाको कन्यारूपमें जन्म दिया। परंतु वे योगनिद्रासे मोहित थीं; अतः 'पुत्र है या पुत्री' इस बातको जान न सकीं। प्रसूतिगृहमें और भी जो स्त्रियाँ थीं, वे सब निद्राके कारण अचेत पड़ी