संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भगवान्का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध और श्रीकृष्णका बछड़े चराना * २८९
उत्पन्न हुआ है। आपलोग संताप न करें। आपके बालकोंकी भवितव्यता ही ऐसी थी। आयु पूरी होनेपर कौन नहीं मारा जाता।' इस प्रकार सान्त्वना दे कंसने उन दोनोंके बन्धन खोल दिये और उन्हें सब प्रकारसे संतुष्ट किया। तत्पश्चात् वह अपने महलके भीतर चला गया।
बन्धनसे मुक्त होनेपर वसुदेवजी नन्दके छकड़ेके पास आये। नन्द बड़े प्रसन्न दिखायी दिये। मुझे पुत्र हुआ है, यह सोचकर वे फूले नहीं समाते थे। वसुदेवजीने भी कहा—'बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस समय वृद्धावस्थामें आपको पुत्र हुआ है। अब तो आपलोगोंने राजाका वार्षिक कर चुका दिया होगा। जिसके लिये यहाँ आये थे, वह काम पूरा हो गया। यहाँ किसी श्रेष्ठ पुरुषको अधिक नहीं ठहरना चाहिये। नन्दजी! जब कार्य हो गया, तब आपलोग क्यों यहाँ बैठे हैं। शीघ्र ही अपने गोकुलमें जाइये। वहाँ रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न मेरा भी एक बालक है। उसका भी अपने ही पुत्रकी भाँति लालन-पालन कीजियेगा।'
वसुदेवजीके यों कहनेपर नन्द आदि गोप छकड़ोंपर सामान लादकर वहाँसे चल दिये। उनके गोकुलमें रहते समय रातमें बालकोंकी हत्या करनेवाली पूतना आयी और सोये हुए कृष्णको लेकर अपना स्तन पिलाने लगी। पूतना रातमें जिस-जिसके मुखमें अपना स्तन डालती थी, उस-उस बालकका शरीर क्षणभरमें निर्जीव हो जाता था। श्रीकृष्णने उसके स्तनको दोनों हाथोंसे पकड़कर खूब जोरसे दबाया और क्रोधमें भरकर उसके प्राणोंसहित दूध पीना आरम्भ किया। उस राक्षसीके शरीरकी नस-नाड़ियोंके बन्धन छिन्न-भिन्न हो गये। वह जोर-जोरसे कराहती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी। मरते समय उसका शरीर बड़ा भयंकर हो गया। पूतनाका चीत्कार सुनकर समस्त ब्रजवासी भयके मारे जाग उठे। उन्होंने आकर देखा, पूतना मरी पड़ी है और श्रीकृष्ण उसकी गोदमें बैठे हैं। यह देखकर माता यशोदा थर्रा उठीं और श्रीकृष्णको शीघ्र ही गोदमें उठाकर गायकी पूँछ घुमाने आदिके द्वारा अपने बालकके ग्रह-दोषको शान्त किया। नन्दने भी गायका गोबर ले श्रीकृष्णके मस्तकमें लगाया और उनकी रक्षा करते हुए इस प्रकार बोले—'समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् श्रीहरि, जिनके नाभिकमलसे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, तुम्हारी रक्षा करें। जिनकी दाढ़के अग्रभागपर रखी हुई यह पृथ्वी सम्पूर्ण जगत्को धारण करती है, वे वराहरूपधारी केशव तुम्हारी रक्षा करें। तुम्हारे गुदाभाग और उदरकी रक्षा भगवान् विष्णु तथा जङ्घा और चरणोंकी रक्षा श्रीजनार्दन करें। जो एक ही क्षणमें वामनसे विराट् बन गये और तीन पगोंसे सारी त्रिलोकीको नापकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न दिखायी देने लगे, वे भगवान् वामन तुम्हारी सदा रक्षा करें। तुम्हारे सिरकी गोविन्द तथा कण्ठकी केशव रक्षा करें। मुख, बाहु, प्रबाहु (कोहनीके नीचेका भाग), मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी अखण्ड ऐश्वर्यशाली अविनाशी भगवान् नारायण रक्षा करें। भगवान् वैकुण्ठ दिशाओंमें, मधुसूदन विदिशाओं (कोणों)-में, हृषीकेश आकाशमें और पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त पृथ्वीपर तुम्हारी रक्षा करें।'
इस प्रकार नन्दगोपद्वारा स्वस्तिवाचन होनेपर बालक श्रीकृष्ण छकड़ेके नीचे एक खटोलेपर सुलाये गये। गोपोंको मरी हुई पूतनाका विशाल शरीर देखकर अत्यन्त भय और आश्चर्य हुआ। एक दिनकी बात है, मधुसूदन श्रीकृष्ण छकड़ेके नीचे सोये हुए थे। उस समय वे दूध पीनेके लिये जोर-जोरसे रोने लगे। रोते-ही-रोते उन्होंने अपने दोनों पैर ऊपरकी ओर फेंकने आरम्भ किये।