भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

२९४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


फणमें कई घाव हो गये। वह जिस फणको ऊपर उठाता, उसीको भगवान् अपने पैरोंसे झुकाकर दबा देते थे। श्रीकृष्णके द्वारा कुचले जानेसे नागको चक्कर आने लगा। वह मूर्च्छित होकर डंडेकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके मस्तक और गर्दन टेढ़े हो गये थे। मुखसे रक्तकी अजस्र धारा बह रही थी। यह देखकर नागराजकी पत्नियाँ भगवान् मधुसूदनकी शरणमें गयीं।

नागपत्नियाँ बोलीं—देवदेवेश्वर! हमने आपको पहचान लिया। आप सबके ईश्वर और सबसे उत्तम हैं। अचिन्त्य परमज्योतिःस्वरूप जो ब्रह्म है, उसीके अंशभूत आप परमेश्वर हैं। देवता भी जिन स्वयम्भू प्रभुकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हींके स्वरूपका वर्णन हम-जैसी साधारण स्त्रियाँ कैसे कर सकती हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायुरूप यह ब्रह्माण्ड जिनके छोटे-से अंशका भी अंश है, उस भगवान्की स्तुति हम कैसे कर सकती हैं। जगन्नाथ! हम बड़े कष्टमें पड़ गयी हैं। आप हमपर कृपा करें। यह नाग अब प्राण त्यागना चाहता है। हमें पतिकी भिक्षा दें।

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर कालिय नागको कुछ आश्वासन मिला। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था तो भी वह धीरे-धीरे बोला—‘देवदेव! मुझपर प्रसन्न हों। नाथ! आपमें अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य स्वाभाविक हैं। आपसे बढ़कर अन्यत्र कहीं भी उनकी स्थिति नहीं है। ऐसे आप परमेश्वरकी मैं क्या स्तुति करूँगा। आप पर हैं। पर (मूल प्रकृति)-के भी आदि कारण हैं। परकी प्रवृत्ति भी आपसे ही हुई है। परात्मन्! आप परसे भी पर हैं। फिर मैं कैसे आपकी स्तुति कर सकता हूँ। ईश्वर! आपने जाति, रूप और स्वभावसे मुझे जैसा बनाया है, उसके अनुसार ही मैंने यह चेष्टा की है। देवदेव! यदि इन सबके विपरीत कोई चेष्टा करूँ तो मुझे दण्ड देना उचित हो सकता है। क्योंकि आपका ऐसा ही आदेश है तथापि आप जगत्के स्वामी हैं। आपने मुझको जो दण्ड दिया है, उसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया; क्योंकि आपसे मिला हुआ दण्ड भी वरदान है। अब मेरे लिये दूसरे वरकी आवश्यकता नहीं है। अच्युत! आपने मेरे बलका नाश किया, मेरे विषको भी हर लिया और पूर्णरूपसे मेरा दमन भी कर दिया। अब एकमात्र जीवन रह गया है। उसे छोड़ दीजिये और कहिये, आपकी क्या सेवा करूँ?’

श्रीभगवान् बोले—‘सर्प! अब तुम्हें यहाँ यमुनाजलमें कदापि नहीं रहना चाहिये। अपने भृत्य और परिवारके साथ समुद्रके जलमें चले जाओ। नाग! तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्न देखकर नागोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे।’

यों कहकर भगवान् श्रीहरिने नागराजको छोड़ दिया। वह भी श्रीकृष्णको प्रणाम करके समुद्रको