भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 434 में से

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पृष्ठ 297

* धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान * २९५

चला गया। उसने सबके देखते-देखते सेवक, संतान, बन्धु-बान्धव और पत्नियोंके साथ सदाके लिये वह कुण्ड त्याग दिया। सर्पके चले जानेपर गोपोंने दौड़कर श्रीकृष्णको छातीसे लगा लिया, मानो वे मरकर पुनः लौट आये हों। उनके नेत्रोंसे आँसू निकलकर श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरने लगे।

कुछ गोप विस्मित होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। यमुना नदीका जल विषसे रहित हो गया—यह देख समस्त गोपोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। गोपियाँ श्रीकृष्णकी मनोहर लीलाओंका गान करने लगीं और ग्वाल-बाल उनके गुणोंकी प्रशंसा करने लगे। उन सबके साथ श्रीकृष्ण व्रजमें आये।


धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान

**व्यासजी कहते हैं—**एक दिन बलराम और श्रीकृष्ण साथ-साथ गौएँ चराते हुए वनमें विचरने लगे। घूमते-घूमते वे परम रमणीय ताड़के वनमें जा पहुँचे। वहाँ धेनुक नामक दानव गदहेके रूपमें सदा निवास करता था। मनुष्यों और गौओंका मांस ही उसका भोजन था। फलकी समृद्धिसे पूर्ण मनोहर तालवनको देखकर ग्वाल-बाल वहाँके फल लेनेको ललचा उठे और बोले—'भैया राम! ओ कृष्ण! धेनुकासुर सदा इस भूभागकी रक्षा करता है। इसीलिये ये ताड़ोंके सुगन्धित फल लोगोंने छोड़ रखे हैं। हम इन्हें प्राप्त करना चाहते हैं। यदि आपलोगोंको जँचे तो इन फलोंको गिराइये।' ग्वाल-बालोंकी यह बात सुनकर बलराम और श्रीकृष्णने बहुत-से तालफल पृथ्वीपर गिराये। गिरते हुए फलोंका शब्द सुनकर वह गर्दभाकार दुष्ट दैत्य क्रोधमें भरा हुआ आया। आते ही उसने अपने दोनों पिछले पैरोंसे बलरामजीकी छातीमें प्रहार किया। बलरामजीने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाना आरम्भ किया। घुमानेसे आकाशमें ही उसके प्राणपखेरू उड़ गये। फिर वेगसे बलरामजीने उसे एक महान् ताल-वृक्षपर दे मारा। जैसे आँधी बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार उस दैत्यने गिरते-गिरते अपने शरीरके आघातसे बहुतेरे फल गिरा दिये।

उसके मारे जानेपर और भी बहुत-से गर्दभाकार दैत्य आये, किंतु श्रीकृष्ण और बलभद्रने उन सबको खेल-खेलमें ही उठाकर वृक्षोंपर फेंक दिया। एक ही क्षणमें पके हुए ताड़के फलों और गर्दभाकार दैत्योंके शरीरसे सारी पृथ्वी पट गयी। इससे उस स्थानकी बड़ी शोभा होने लगी। तबसे उस तालवनमें गौएँ बाधारहित होकर नयी-नयी घास चरने लगीं।

अनुचरोंसहित धेनुकासुरके मारे जानेपर वह मनोहर तालवन समस्त गोप-गोपियोंके लिये सुखदायक हो गया। इससे वसुदेवके दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए। वे दोनों महात्मा छोटे-छोटे सींगोंवाले बछड़ोंकी भाँति शोभा पा रहे थे। कंधेपर गाय बाँधनेकी रस्सी लिये, वनमालासे विभूषित हो वे दूर-दूरतक गौएँ चराते और उनके नाम ले-लेकर पुकारते थे। श्रीकृष्णका वस्त्र सुनहरे रंगका था और बलरामजीका नीले रंगका। उन्हें धारण किये वे दोनों भाई दो इन्द्रधनुषों एवं श्वेत-श्याम मेघोंकी भाँति शोभा पाते थे। लोकमें बालकोंके जो-जो खेल प्रचलित हैं, उन सबके द्वारा परस्पर क्रीड़ा करते हुए वनमें विचरते थे। समस्त लोकनाथोंके नाथ होकर भी वे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए और मानवधर्ममें तत्पर रहकर मनुष्ययोनिको गौरवान्वित करते थे।

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