संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
करूँगा, सुनो। ऋचेयुके पुत्र राजा मतिनार हुए। मतिनारके तीन बड़े धर्मात्मा पुत्र थे—वसुरोध, प्रतिरथ और सुबाहु। ये सभी वेदवेत्ता तथा सत्यवादी थे। मतिनारकी एक कन्या भी थी, जिसका नाम इला था। वह ब्रह्मवादिनी थी। उसका विवाह तंसुसे हुआ। तंसुके पुत्र राजर्षि धर्मनेत्र हुए। इनकी स्त्री उपदानवी थी। उपदानवीसे उन्होंने चार पुत्र उत्पन्न किये—दुष्यन्त, सुष्मन्त, प्रवीर और अनघ। दुष्यन्तके पुत्र पराक्रमी भरत हुए, जो सर्वदमनके नामसे विख्यात थे। उनमें दस हजार हाथियोंका बल था। वे शकुन्तलाके गर्भसे उत्पन्न चक्रवर्ती राजा थे। उन्हींके नामपर इस देशको भारतवर्ष कहते हैं। अङ्गिरानन्दन बृहस्पतिजीके पुत्र महामुनि भरद्वाजने भरतसे पुत्रोत्पत्तिके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान कराया। इसके पहले पुत्र-जन्मका सारा प्रयास व्यर्थ हो चुका था। अतः भरद्वाजके प्रयत्नसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम वितथ हुआ। वितथके जन्मके बाद राजा भरत स्वर्गवासी हो गये, तब भरद्वाजजी वितथको राज्यपर अभिषिक्त करके वनमें चले गये। वितथने पाँच पुत्र उत्पन्न किये—सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्ग तथा महात्मा कपिल। सुहोत्रके दो पुत्र थे—महासत्यवादी काशिक तथा राजा गृत्समति। गृत्समतिके पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोंके लोग हुए।
मुनिवरो! अब अजमीढ नामक दूसरे वंशका वर्णन सुनो। सुहोत्रका एक पुत्र था—बृहत्। उसके तीन पुत्र हुए—अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ। अजमीढसे नीलीके गर्भसे सुशान्ति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सुशान्तिसे पुरुजाति और पुरुजातिसे बाह्याश्वका जन्म हुआ। बाह्याश्वके पाँच पुत्र हुए, जो समृद्धिशाली पाँच जनपदोंसे युक्त थे। उनके नाम यों हैं—मुद्गल, सृञ्जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी यवीनर तथा कृमिलाश्व। ये पाँचों देशोंकी रक्षाके लिये अलम् (समर्थ) थे; इसलिये उनके अधिकारमें आये हुए जनपद पञ्चाल कहलाये। मुद्गलके पुत्र महायशस्वी मौद्गल्य थे। महात्मा सृञ्जयके पुत्र पञ्चजन हुए। पञ्चजनके सोमदत्त, सोमदत्तके सहदेव और सहदेवके सोमक हुए। सोमकके पुत्रका नाम जन्तु था, जिसके सौ पुत्र हुए। उन सबमें छोटे पृषत् थे, जिनके पुत्र द्रुपद हुए। ये सभी आजमीढ तथा सोमक क्षत्रिय कहलाते हैं। अजमीढके एक और पत्नी थीं, जिनका नाम था—धूमिनि। रानी धूमिनी बड़ी पतिव्रता थीं। ये पुत्रकी कामनासे व्रत करने लगीं। दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके उन्होंने विधिपूर्वक अग्निमें हवन किया तथा पवित्रतापूर्वक नियमित भोजन करके वे अग्निहोत्रके कुशोंपर ही लेट गयीं। उसी अवस्थामें राजा अजमीढने धूमिनीदेवीके साथ समागम किया। इससे ऋक्ष नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। ऋक्ष धूम्रके समान वर्णवाले एवं दर्शनीय पुरुष थे। ऋक्षसे संवरण और संवरणसे कुरु उत्पन्न हुए, जिन्होंने प्रयागसे जाकर कुरुक्षेत्रकी स्थापना की। वह बड़ा ही पवित्र एवं रमणीय क्षेत्र है। कितने ही पुण्यात्मा पुरुष उसका सेवन करते हैं। कुरुका महान् वंश उन्हींके नामपर कौरव कहलाया। कुरुके चार पुत्र हुए—सुधन्वा, सुधनु, परीक्षित् और अरिमेजय। परीक्षित्के पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, अग्रसेन और भीमसेन हुए। ये सभी बलशाली और पराक्रमी थे। जनमेजयके पुत्र सुरथ हुए, सुरथके विदूरथ, विदूरथके महारथी ऋक्ष हुए। ये दूसरे ऋक्ष थे। इस सोमवंशमें दो ऋक्ष, दो ही परीक्षित्, तीन भीमसेन तथा दो जनमेजय नामके राजा हुए। द्वितीय ऋक्षके पुत्र