संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें- ययाति-पुत्रोंके वंशका वर्णन * ३७
भीमसेन थे। भीमसेनसे प्रतीप और प्रतीपसे शान्तनु, देवापि तथा बाह्लीक—ये तीन महारथी पुत्र हुए।
अब राजर्षि बाह्लीकके वंशका वृत्तान्त सुनो। बाह्लीकके पुत्र महायशस्वी सोमदत्त थे। सोमदत्तसे भूरि, भूरिश्रवा और शल—ये तीन पुत्र हुए। देवापि देवताओंके उपाध्याय और मुनि हुए। शान्तनु कौरववंशका भार वहन करनेवाले राजा हुए। अब मैं शान्तनुके त्रिभुवनविख्यात वंशका वर्णन करूँगा। शान्तनुने गङ्गाके गर्भसे देवव्रत नामक पुत्र उत्पन्न किया। देवव्रत ही भीष्म नामसे विख्यात पाण्डवोंके पितामह थे। तत्पश्चात् शान्तनुकी काली नामवाली पत्नीने विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो पिताका प्यारा तथा धर्मात्मा था। विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंसे श्रीकृष्णद्वैपायनने धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुरको जन्म दिया। धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। उन सबमें दुर्योधन ज्येष्ठ था। पाण्डुके पुत्र अर्जुन हुए। अर्जुनसे सुभद्राकुमार अभिमन्युकी उत्पत्ति हुई। अभिमन्युसे परीक्षित् और परीक्षित्से जनमेजयका जन्म हुआ। जनमेजयके काश्या नामकी पत्नीसे चन्द्रापीड़ तथा सूर्यापीड़ नामक दो पुत्र हुए। उनमें सूर्यापीड़ मोक्ष-धर्मके ज्ञाता थे। चन्द्रापीड़के महान् धनुर्धर सौ पुत्र थे। ये सब इस पृथ्वीपर जानमेजय क्षत्रियके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन सौ पुत्रोंमें सबसे बड़ा सत्यकर्ण था, जो हस्तिनापुरमें रहा करता था। महाबाहु सत्यकर्ण प्रचुर दक्षिणा देनेवाले थे। सत्यकर्णके पुत्र प्रतापी श्वेतकर्ण हुए। वे पुत्र न होनेके कारण तपोवनमें चले गये। वहाँ सुचारुकी पुत्री मालिनी, जो यदुकुलमें उत्पन्न हुई थी, वनमें आयी थी। उसने श्वेतकर्णसे गर्भ धारण किया। उस गर्भके स्थापित हो जानेपर राजा श्वेतकर्ण पहलेके किये हुए संकल्पके अनुसार महाप्रस्थानको चले। अपने प्रियतमको जाते देख मालिनी भी उनके पीछे लग गयी। मार्गमें उसने एक सुकुमार शिशुको जन्म दिया, किन्तु उसको भी छोड़कर वह पतिव्रता पतिके पीछे चल दी। नवजात शिशु पर्वतकी घाटीपर रो रहा था। तब उसपर कृपा करनेके लिये आकाशमें मेघ प्रकट हो गये। श्रविष्ठाके दो पुत्र थे—पैप्पलादि और कौशिक। वे दोनों उस शिशुको देख दयासे द्रवीभूत हो गये। उन्होंने उसे उठाकर जलसे धोया और रक्तमें डूबे हुए उसके पार्श्वभागको शिलापर रगड़कर साफ किया। रगड़नेपर उसकी दोनों पसलियाँ बकरेकी भाँति श्यामवर्णकी हो गयीं। इसलिये उन दोनोंने उस बालकका नाम अजपार्श्व रख दिया। उसे रेमककी शालामें दो ब्राह्मणोंने पाल-पोसकर बड़ा किया। रेमककी पत्नीने अपना पुत्र बनानेके लिये उसे गोद ले लिया। तबसे वह रेमकीका पुत्र माना जाने लगा। दोनों ब्राह्मण उसके सचिव हुए। उन सबके पुत्र और पौत्र एक ही समयमें—समान आयुवाले हुए। यह महात्मा पाण्डवोंका पौरववंश बतलाया गया। नहुषनन्दन ययातिने अपनी वृद्धावस्थाका परिवर्तन करते समय अत्यन्त प्रसन्न हो यह उद्गार प्रकट किया था—‘सम्भव है यह पृथ्वी चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहोंके प्रकाशसे रहित हो जाय; किन्तु पौरववंशसे सूनी यह कभी नहीं होगी।’ इस प्रकार मैंने राजा पूरुके विख्यात वंशका वर्णन किया। अब तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और यदुके वंशका वर्णन करूँगा।
तुर्वसुके पुत्र वह्नि, वह्निके गोभानु, गोभानुके राजा त्रैशानु, त्रैशानुके करंधम तथा करंधमके मरुत्त हुए। अवीक्षित्-नन्दन राजा मरुत्त इस मरुत्तसे भिन्न हैं। करंधमकुमार मरुत्तके कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने बहुत दक्षिणा देकर यज्ञ किया, उसमें उन्होंने दक्षिणाके रूपमें महात्मा संवर्तको अपनी संयता नामकी कन्या दे दी। तत्पश्चात् उन्होंने