संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
पूरुवंशी दुष्यन्तको गोद ले लिया। इस प्रकार ययातिके शापवश जब तुर्वसुका वंश नहीं चला, तब उसमें पौरववंशका प्रवेश हुआ। दुष्यन्तके पुत्र राजा करूरोम हुए। करूरोमसे अह्नीदकी उत्पत्ति हुई। अह्नीदके चार पुत्र हुए—पाण्ड्य, केरल, कोल तथा चोल। द्रुह्युके पुत्र बभ्रुसेतु, बभ्रुसेतुके अङ्गारसेतु और अङ्गारसेतुके मरुत्पति हुए, जो युद्धमें युवनाश्वकुमार मान्धाताके हाथसे मारे गये। अङ्गारसेतुके पुत्र राजा गान्धार हुए, जिनके नामपर गान्धार प्रदेश विख्यात है। गान्धारदेशके घोड़े सब घोड़ोंसे अच्छे होते हैं। अनुके पुत्र धर्म, धर्मके घृत, घृतके वनदुह, वनदुहके प्रचेता और प्रचेताके सुचेता हुए। ये अनुके वंशज बतलाये गये। यदुके पाँच पुत्र हुए, जो देवकुमारोंके समान सुन्दर थे। उनके नाम हैं—सहस्राद, पयोद, क्रोष्टु, नील और अञ्जिक। सहस्रादके तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए—हैहय, हय तथा वेणुहय। हैहयका पुत्र धर्मनेत्र हुआ। धर्मनेत्रके कार्त और कार्तके साहञ्ज नामक पुत्र हुए। साहञ्जने साहञ्जनी नामकी नगरी बसायी। साहञ्जका दूसरा नाम महिष्मान् भी था। उनके पुत्र प्रतापी भद्रश्रेण्य थे। भद्रश्रेण्यके दुर्दम और दुर्दमके कनक हुए। कनकके चार पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—कृतवीर्य, कृतौजा, कृतधन्वा तथा कृताग्नि।
कृतवीर्यसे अर्जुनकी उत्पत्ति हुई, जो सहस्र भुजाओंसे युक्त हो सात द्वीपोंका राजा हुआ। उसने अकेले ही सूर्यके समान तेजस्वी रथद्वारा सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लिया था। उसने दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या करके दत्तात्रेयजीकी आराधना की। दत्तात्रेयजीने उसे कई वरदान दिये। पहले तो उसने युद्धकालमें एक हजार भुजाएँ माँगी। युद्ध करते समय किसी योगीश्वरकी भाँति उसके एक सहस्र भुजाएँ प्रकट हो जाती थीं, उसने द्वीप, समुद्र और नगरोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको कठोरतापूर्वक जीता तथा सात द्वीपोंमें सात सौ यज्ञ किये, उन सभी यज्ञोंमें एक-एक लाखकी दक्षिणा दी गयी थी। सबमें सोनेके यूप गड़े थे, सोनेकी ही वेदियाँ बनी थीं। वहाँ दिव्य वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत देवताओं और गन्धर्वोंके साथ महर्षिगण भी विमानपर बैठकर सुशोभित होते थे। कार्तवीर्यके यज्ञमें नारद नामक गन्धर्वने इस गाथाका गान किया—'अन्य राजालोग यज्ञ, दान, तपस्या, पराक्रम और शास्त्र-ज्ञानमें कार्तवीर्य अर्जुनकी स्थितिको नहीं पहुँच सकते।' वह योगी था; इसलिये सातों द्वीपोंमें ढाल, तलवार, धनुष-बाण और रथ लिये सदा चारों ओर विचरता दिखायी देता था, धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करनेवाले महाराज कार्तवीर्यके प्रभावसे किसीका धन नष्ट नहीं होता था, किसीको रोग नहीं सताता था तथा कोई भ्रममें नहीं पड़ता था। वे सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न चक्रवर्ती सम्राट् थे। वे ही पशुओं तथा खेतोंके भी रक्षक थे और वे ही योगी होनेके कारण वर्षा करते हुए मेघ बन जाते थे। जैसे शरद्-ऋतुमें भगवान् भास्कर अपनी सहस्रों किरणोंसे शोभायमान होते हैं, उसी प्रकार राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सहस्रों भुजाओंसे शोभा पाते थे। उन्होंने कर्कोटक नागके पुत्रोंको जीतकर उन्हें अपनी नगरी माहिष्मतीपुरीमें मनुष्योंके साथ बसाया था। वे वर्षाकालमें समुद्रमें जलक्रीड़ा करते समय अपनी भुजाओंसे रोककर उसकी जलराशिके वेगको पीछेकी ओर लौटा देते थे। उनकी राजधानीको घेरकर बहनेवाली नर्मदा नदीमें जब वे जलक्रीड़ा करते समय लोटते थे, उस समय वह नदी अपनी सहस्रों चञ्चल लहरोंके साथ डरती-डरती उनके पास आती थी। महासागरमें