संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* श्रीविष्णुमें भक्ति होनेका क्रम और कलि-धर्मका निरूपण * ४०१
श्रेष्ठ पृथूदकतीर्थकी ओर चल दिया। वहाँ निराहार रहनेका संकल्प लेकर ब्रह्मराक्षसने प्राण त्याग दिया। उस गीतके फलसे पुण्यकी वृद्धि होनेके कारण उसका उस राक्षसयोनिसे उद्धार हो गया। पृथूदकतीर्थके प्रभावसे दुर्लभ ब्रह्मलोकमें जाकर उसने दस हजार वर्षोंतक वहाँ निर्भय निवास किया। अन्तमें वह जितेन्द्रिय ब्राह्मण हुआ और उसे पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा। अब चाण्डालकी शेष कथा कहता हूँ, सुनो! राक्षसके चले जानेपर वह बुद्धिमान् एवं संयमी चाण्डाल अपने घर आया। उस घटनासे चाण्डालके मनमें बड़ा वैराग्य हुआ। उसने अपनी पत्नीकी रक्षाका भार पुत्रोंपर डाल दिया और स्वयं पृथ्वीकी परिक्रमा आरम्भ कर दी। कोकामुखसे लेकर जहाँ भगवान् स्कन्दके दर्शन होते हैं, वहाँतक गया। स्कन्दका दर्शन करके वह धारा नगरीमें गया। वहाँ भी प्रदक्षिणा करके वह पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचलपर जाकर पापमोचनतीर्थमें पहुँचा। वहाँ उस चाण्डालने स्नान किया, जो सब पापोंको दूर करनेवाला है। फिर पापरहित हो वह उत्तम गतिको प्राप्त हुआ।
श्रीविष्णुमें भक्ति होनेका क्रम और कलि-धर्मका निरूपण
**मुनियोंने कहा—**महामते! हमने भगवान् श्रीकृष्णके समीप जागरणपूर्वक गीत सुनानेका फल सुना, जिससे वह चाण्डाल परम गतिको प्राप्त हुआ। अब जिस तपस्या अथवा कर्मसे भगवान् विष्णुमें हमारी भक्ति हो सके, वह हमें बताइये। इस समय हम यही विषय सुनना चाहते हैं।
**व्यासजी बोले—**मुनिवरो! भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति महान् फल देनेवाली है। वह मनुष्यको जिस प्रकार होती है, वह सब क्रमशः बतलाता हूँ; ध्यान देकर सुनो। ब्राह्मणो! यह संसार अत्यन्त घोर और समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर है। नाना प्रकारके सैकड़ों दुःखोंसे व्याप्त और मनुष्योंके हृदयमें महान् मोहका संचार करनेवाला है। इस जगत्में पशु-पक्षी आदि हजारों योनियोंमें बारंबार जन्म लेनेके पश्चात् देहधारी जीव कभी किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाता है। मनुष्योंमें भी ब्राह्मणत्व, ब्राह्मणत्वमें भी विवेक, विवेकसे भी धर्मनिष्ठ बुद्धि और बुद्धिसे भी कल्याणमय मार्गोंका ग्रहण होना अत्यन्त दुर्लभ है। मनुष्योंके पूर्वजन्मका संचित पाप जबतक नष्ट नहीं हो जाता, तबतक जगन्मय भगवान् वासुदेवमें उनकी भक्ति नहीं होती। अतः ब्राह्मणो! श्रीकृष्णमें जिस प्रकार भक्ति होती है, वह सुनो।
अन्य देवताओंके प्रति मनुष्यकी जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा तद्गतचित्तसे भक्ति होती है, उससे यज्ञमें उसका मन लगता है; फिर वह एकाग्रचित्त होकर अग्निकी उपासना करता है। अग्निदेवके संतुष्ट होनेपर भगवान् भास्करमें उसकी भक्ति होती है। तबसे वह निरन्तर सूर्यदेवकी आराधना करने लगता है। भगवान् सूर्यके प्रसन्न होनेपर उसकी भक्ति भगवान् शंकरमें होती है, फिर वह बड़े यत्नके साथ विधिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करता है। जब महादेवजी संतुष्ट होते हैं, तब मनुष्यकी भक्ति भगवान् श्रीकृष्णमें होती है। तब वह वासुदेवसंज्ञक अविनाशी भगवान् जगन्नाथका पूजन करके भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है।
**मुनियोंने पूछा—**महामुने! संसारमें जो अवैष्णव मनुष्य देखे जाते हैं, वे श्रीविष्णुका पूजन क्यों नहीं करते? इसका कारण बतलाइये।
**व्यासजी बोले—**मुनिवरो! इस संसारमें दो प्रकारके भूतसर्ग विख्यात हैं—एक आसुर और दूसरा दैव। पूर्वकालमें इन दोनोंकी सृष्टि ब्रह्माजीने ही की थी। दैवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले मनुष्य भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं और आसुरी प्रकृतिको प्राप्त हुए लोग श्रीहरिकी निन्दा किया