संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करते हैं। ऐसे लोग मनुष्योंमें अधम हैं। श्रीहरिकी मायासे उनकी बुद्धि मारी गयी है। ब्राह्मणो! वे श्रीहरिको न पाकर नीच गतिमें जाते हैं। भगवान्की माया बड़ी गूढ़ है। देवताओं और असुरोंके लिये भी उसका ज्ञान होना कठिन है। वह मनुष्योंके हृदयमें महान् मोहका संचार करती है। जिन्होंने मनको वशमें नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये उस मायाको पार करना कठिन है।
मुनियोंने कहा— महर्षे! अब हम आपसे जगत्के संहारकी कथा सुनना चाहते हैं। कल्पके अन्तमें जो महाप्रलय होता है, उसका वर्णन कीजिये।
व्यासजी बोले— मुनिवरो! कल्पके अन्तमें तथा प्राकृत प्रलयमें जो जगत्का संहार होता है, उसका वर्णन सुनो। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग हैं, जो देवताओंके बारह हजार दिव्य वर्षोंमें समास होते हैं। समस्त चतुर्युग स्वरूपसे एक-से ही होते हैं। सृष्टिके आरम्भमें सत्ययुग होता है तथा अन्तमें कलियुग रहता है। ब्रह्माजी प्रथम कृतयुगमें जिस प्रकार सृष्टिका आरम्भ करते हैं, वैसे ही अन्तिम कलियुगमें उसका उपसंहार करते हैं।
मुनियोंने कहा— भगवन्! कलिके स्वरूपका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिसमें चार चरणोंवाले भगवान् धर्म खण्डित हो जाते हैं।
व्यासजी बोले— निष्पाप मुनियो! तुम जो मुझसे कलिका स्वरूप पूछते हो, वह तो बहुत बड़ा है; तथापि मैं संक्षेपसे बतलाता हूँ, सुनो। कलियुगमें मनुष्योंकी वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचारमें प्रवृत्ति नहीं होगी। सामवेद, ऋग्वेद और यजुर्वेदकी आज्ञाके पालनमें भी कोई प्रवृत्त न होगा। कलियुगमें विवाहको धर्म नहीं माना जायगा। शिष्य गुरुके अधीन नहीं रहेंगे। पुत्र भी अपने धर्मका पालन नहीं करेंगे। अग्निहोत्रका नियम उठ जायगा। कोई किसी भी कुलमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो—जो बलवान् होगा, वही कलियुगमें सबका स्वामी होगा। सभी वर्णोंके लोग कन्या बेचकर जीवन-निर्वाह करेंगे। ब्राह्मणो! कलियुगमें जिस किसीका जो भी वचन होगा, सब शास्त्र ही माना जायगा। कलियुगमें सब देवता होंगे और सबके लिये सब आश्रम होंगे। अपनी-अपनी रुचिके अनुसार अनुष्ठान करके उसमें उपवास, परिश्रम और धनका व्यय करना धर्म कहा जायगा। कलियुगमें थोड़े-से ही धनसे मनुष्योंको बड़ा घमंड होगा। स्त्रियोंको अपने केशोंपर ही रूपवती होनेका गर्व होगा। सुवर्ण, मणि और रत्न आदि तथा वस्त्रोंके भी नष्ट हो जानेपर स्त्रियाँ केशोंसे ही शृङ्गार करेंगी। कलियुगकी स्त्रियाँ धनहीन पतिको त्याग देंगी। उस समय धनवान् पुरुष ही युवतियोंका स्वामी होगा। जो-जो अधिक देगा, उसे-उसे ही मनुष्य अपना मालिक मानेंगे। उस समय लोग प्रभुताके ही कारण सम्बन्ध रखेंगे। द्रव्यराशि घर बनानेमें ही समास हो जायगी। उससे दान-पुण्यादि न होंगे। बुद्धि द्रव्योंके संग्रहमात्रमें ही लगी रहेगी। उसके द्वारा आत्मचिन्तन न होगा। सारा धन उपभोगमें ही समास हो जायगा। उससे धर्मका अनुष्ठान न होगा। कलियुगकी स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी होंगी। हाव-भाव-विलासमें ही उनकी स्पृहा रहेगी। अन्यायसे धन पैदा करनेवाले पुरुषोंमें ही उनकी आसक्ति होगी। सुहृदोंके निषेध करनेपर भी मनुष्य एक-एक पाईके लिये भी दूसरोंके स्वार्थकी हानि कर देंगे।
ब्राह्मणो! कलियुगमें सब लोग सदा सबके साथ समानताका दावा करेंगे। गायोंके प्रति तभीतक गौरव रहेगा, जबतक कि वे दूध देती रहेंगी। कलियुगकी प्रजा प्रायः अनावृष्टि और क्षुधाके भयसे व्याकुल रहेगी। सबके नेत्र आकाशकी ओर लगे रहेंगे। वर्षा न होनेसे दुःखी मनुष्य