भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४०४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भगवान् पुरुषोत्तमका लोग यज्ञोंद्वारा यजन न करें, तब-तब यह समझना चाहिये कि कलियुगका बल बढ़ रहा है। द्विजवरो! जब वेदवादमें प्रेम न हो और पाखण्डमें अनुराग बढ़ता जाय, तब विद्वान् पुरुषोंको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये। ब्राह्मणो! कलियुगमें पाखण्डसे दूषित चित्तवाले मनुष्य सबकी सृष्टि करनेवाले जगत्पति भगवान् विष्णुकी आराधना नहीं करेंगे। उस समय पाखण्डसे प्रभावित मनुष्य ऐसा कहेंगे कि 'देवताओंसे क्या लेना है। ब्राह्मणों और वेदोंसे क्या लाभ है। जलसे होनेवाली शुद्धिमें क्या रखा है।'<sup></sup> कलियुगमें मेघ थोड़ी वृष्टि करेंगे। खेतीमें बहुत कम फल लगेंगे और वृक्षोंके फल सारहीन होंगे। कलिमें प्रायः लोग घुटनोंतक वस्त्र पहनेंगे। वृक्षोंमें शमीकी ही अधिकता होगी। चारों वर्णोंके सब लोग प्रायः शूद्रवत् हो जायँगे।<sup></sup> कलियुगके आनेपर प्रायः छोटे-छोटे धान्य होंगे। अधिकतर बकरियोंका दूध मिलेगा और उशीर (खस) ही एकमात्र अनुलेपन होगा। कलियुगमें अधिकतर सास और ससुर ही लोगोंके गुरुजन होंगे। मुनिवरो! उस समय मनोहारिणी भार्या और साले आदि ही सुहृद् समझे जायँगे। लोग अपने ससुरके अनुगामी होकर कहेंगे कि 'कौन किसकी माता है और कौन किसका पिता। सब जीव अपने कर्मोंके अनुसार ही जन्मते और मरते हैं।'<sup></sup> उस समय थोड़ी बुद्धिवाले मनुष्य मन, वाणी और शरीरके दोषोंसे प्रभावित होकर प्रतिदिन बारंबार पाप करेंगे। सत्य, शौच और लज्जासे रहित मनुष्योंके लिये जो-जो दुःखकी बात हो सकती है, वह सब कलिकालमें होगी। संसारमें स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा और स्वाहाका शब्द नहीं सुनायी देगा। उस समय स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण कोई विरला ही होगा। एक विशेषता अवश्य है, कलियुगमें थोड़ा-सा ही प्रयत्न करनेपर मनुष्य वह उत्तम पुण्यराशि प्राप्त कर सकता है, जो सत्ययुगमें बहुत बड़ी तपस्यासे ही साध्य हो सकती है।

ब्राह्मणो! कलियुग धन्य है, जहाँ थोड़े ही क्लेशसे महान् फलकी प्राप्ति होती है तथा स्त्री और शूद्र भी धन्य हैं। इसके सिवा और भी सुनो। सत्ययुगमें दस वर्षतक तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदिका अनुष्ठान करनेसे जो फल मिलता है, वह त्रेतामें एक वर्ष, द्वापरमें एक मास तथा कलियुगमें एक दिन-रातके ही अनुष्ठानसे मिल जाता है। इसीलिये मैंने कलियुगको श्रेष्ठ बताया। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें पूजन करनेसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वही कलियुगमें केशवका नाम-कीर्तन करनेमात्रसे मिल जाता है। धर्मज्ञ ब्राह्मणो! इस कलियुगमें थोड़े-से परिश्रमसे ही मनुष्यको महान् धर्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसीलिये मैं कलियुगसे अधिक संतुष्ट हूँ।<sup></sup>

अब शूद्रोंकी विशेषताका वर्णन सुनो। द्विजोंको


१-किं देवैः किं द्विजैर्वेदैः किं शौचेनाम्बुजन्मना। इत्येवं प्रलपिष्यन्ति पाखण्डोपहता नराः॥ (२२९।५०)
२-जानुप्रायाणि वस्त्राणि शमीप्राया महीरुहाः। शूद्रप्रायास्तथा वर्णा भविष्यन्ति कलौ युगे॥ (२२९।५२)
३-कस्य माता पिता कस्य यदा कर्मात्मकः पुमान्। इति चोदाहरिष्यन्ति श्वशुरानुगता नराः॥ (२२९।५५)
४-धन्ये कलौ भवेद्विप्रास्त्वल्पक्लेशैर्महत्फलम्। तथा भवेतां स्त्रीशूद्रौ धन्यौ चान्यन्निबोधत॥
 यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्। द्वापरे तच्च मासेन अहोरात्रेण तत्कलौ॥
 तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश्च फलं द्विजाः। प्राप्नोति पुरुषस्तेन कलिः साध्विति भाषितुम्॥
 ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥
 धर्मोत्कर्षमतीवात्र प्राप्नोति पुरुषः कलौ। स्वल्पायासेन धर्मज्ञास्तेन तुष्टोऽस्म्यहं कलौ॥
(२२९।६१-६५)