भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

* पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह * ८३

प्रसन्न होकर उनका शरीर पहले-जैसा कर दिया। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवने परम अद्भुत त्रिनेत्रधारी विग्रह धारण किया। उस समय उनके तेजसे तिरस्कृत हो सम्पूर्ण देवताओंने नेत्र बंद कर लिये। तब उन्होंने देवताओंको दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे उनके स्वरूपको देख सकते थे। वह दृष्टि पाकर देवताओंने परम देवेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया। उस समय पार्वतीदेवीने अत्यन्त प्रसन्न हो समस्त देवताओंके देखते-देखते अपने हाथकी माला भगवान्के चरणोंमें चढ़ा दी।

यह देख सब देवता साधु-साधु कहने लगे। फिर उन लोगोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर देवीसहित महादेवजीको प्रणाम किया। इसके बाद देवताओंसहित मैंने हिमवान्से कहा—'शैलराज! तुम सबके लिये स्पृहणीय, पूजनीय, वन्दनीय तथा महान् हो; क्योंकि साक्षात् महादेवजीके साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो रहा है। यह तुम्हारे लिये महान् अभ्युदयकी बात है। अब शीघ्र ही कन्याका विवाह करो, विलम्ब क्यों करते हो?'

मेरी बात सुनकर हिमवान्ने नमस्कारपूर्वक मुझसे कहा—'देव! मेरे सब प्रकारके अभ्युदयमें आप ही कारण हैं। पितामह! जब जिस विधिसे विवाह करना उचित हो, वह सब आप ही करायें।' तब मैंने भगवान् शिवसे कहा—'देव! अब उमाके साथ विवाह करें।' उन्होंने उत्तर दिया—'जैसी आपकी इच्छा।' फिर तो हमलोगोंने महादेवजीके विवाहके लिये तुरंत ही एक मण्डप तैयार किया, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। बहुत-से रत्न चित्र-विचित्र मणियाँ, सुवर्ण और मोती आदि द्रव्य स्वयं ही मूर्तिमान् होकर उस मण्डपको सजाने लगे। मरकतमणिका बना हुआ फर्श विचित्र दिखायी देने लगा। सोनेके खम्भोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। स्फटिकमणिकी बनी हुई दीवार चमक रही थी। द्वारपर मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणि सूर्य और चन्द्रमाके प्रकाश पाकर पिघल रहे थे। वायु मनोहर सुगन्ध लेकर भगवान् शिवके प्रति अपनी भक्तिका परिचय देती हुई मन्द गतिसे बहने लगी। उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था। चारों समुद्र, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता, देवनदियाँ, महानदियाँ, सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस, जलचर, खेचर, किन्नर तथा चारणगण भी उस विवाहोत्सवमें (मूर्तिमान् होकर) सम्मिलित हुए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि सामगान करनेवाले गन्धर्व मनोहर बाजे लेकर उस विशाल मण्डपमें आये थे। ऋषि कथाएँ कहते, तपस्वी वेद पढ़ते तथा मन-ही-मन प्रसन्न होकर वे पवित्र वैवाहिक मन्त्रोंका जप करते थे। सम्पूर्ण जगन्माताएँ और देवकन्याएँ हर्षमग्न हो मङ्गलगान कर रही थीं। भगवान् शङ्करका विवाह हो रहा है, यह जानकर भाँति-भाँतिकी सुगन्ध और सुखका विस्तार