संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करनेवाली छहों ऋतुएँ वहाँ साकार होकर उपस्थित थीं।
इस प्रकार जब सम्पूर्ण भूत वहाँ एकत्रित हुए और नाना प्रकारके बाजे बजने लगे, उस समय मैं पार्वतीको योग्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कराकर स्वयं ही मण्डपमें ले आया। फिर मैंने भगवान् शङ्करसे कहा—‘देव! मैं आपका आचार्य बनकर अग्निमें हवन करूँगा। यदि आप मुझे आज्ञा दें तो विधिपूर्वक इस कार्यका अनुष्ठान आरम्भ हो।’ तब देवाधिदेव शङ्करने मुझसे इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! जो भी शास्त्रोक्त विधान हो, उसे इच्छानुसार कीजिये; मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा।’ यह सुनकर मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और मैंने तुरंत ही कुश हाथमें लेकर महादेवजी तथा पार्वतीदेवीके हाथोंको योगबन्धसे युक्त कर दिया। उस समय वहाँ अग्निदेव स्वयं ही हाथ जोड़कर उपस्थित हो गये। श्रुतियोंके गीत और महामन्त्र भी मूर्तिमान् होकर आ गये थे। मैंने शास्त्रीय विधिसे अमृतस्वरूप घृतका होम किया और उस दिव्य दम्पतिके द्वारा अग्निकी प्रदक्षिणा करायी। उसके बाद उनके हाथोंको योगबन्धसे मुक्त किया। इस प्रकार क्रमशः वैवाहिक विधि पूर्ण की गयी। इस कार्यमें सम्पूर्ण देवताओं, मेरे मानस पुत्रों तथा सिद्धोंका भी सहयोग था। विवाह समाप्त होनेपर मैंने भगवान् शङ्करको प्रणाम किया। योगशक्तिसे ही पार्वती और परमेश्वरका उत्तम विवाह सम्पन्न हुआ। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम सब लोगोंसे पार्वतीजीके स्वयंवर और महादेवजीके उत्तम विवाहकी कथा कह सुनायी।
देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन
**ब्रह्माजी कहते हैं—**अमित तेजस्वी महादेवजीका विवाह हो जानेपर इन्द्र आदि देवताओंके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने भगवान् शङ्करको प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति आरम्भ की।
**देवता बोले—**पर्वत जिनका लिङ्गमय स्वरूप है, जो पर्वतोंके स्वामी हैं, जिनका वेग पवनके समान है, जो विकृत रूप धारण करनेवाले तथा अपराजित हैं, जो क्लेशोंका नाश करके शुभ सम्पत्ति प्रदान करते हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। नीले रंगकी चोटी धारण करनेवाले अम्बिकापतिको नमस्कार है; वायु जिनका स्वरूप है और जो सैकड़ों रूप धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको प्रणाम है। दैत्योंके योगका नाश करनेवाले तथा योगियोंके गुरु महादेवजीको प्रणाम