संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन * ८५
है। सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं तथा जो ललाटमें भी नेत्र धारण करते हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो श्मशानमें क्रीड़ा करते और वर देते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, उन देवेश्वर शिवको प्रणाम है। जो गृहस्थ होते हुए भी साधु हैं, नित्य जटा एवं ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो जलमें तपस्या करते, योगजनित ऐश्वर्य देते, मनको शान्त रखते, इन्द्रियोंका दमन करते तथा प्रलय और सृष्टिके कर्ता हैं, उन महादेवजीको प्रणाम है। अनुग्रह करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। पालन करनेवाले शिवको प्रणाम है। रुद्र, वसु, आदित्य और अश्विनीकुमारोंके रूपमें वर्तमान भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो सबके पिता, सांख्यवर्णित पुरुष, विश्वेदेव, शर्व, उग्र, शिव, वरद, भीम, सेनानी, पशुपति, शुचि, वैरिहन्ता, सद्योजात, महादेव, चित्र, विचित्र, प्रधान, अप्रमेय, कार्य और कारण नामसे प्रतिपादित होते हैं, उन भगवान् शिवको प्रणाम है। भगवन्! पुरुषरूपमें आपको नमस्कार है। पुरुषमें इच्छा उत्पन्न करनेवाले आपको प्रणाम है। आप ही पुरुषका प्रकृतिके साथ संयोग कराते हैं और आप ही प्रकृतिमें गुणोंका आधान करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप प्रकृति और पुरुषके प्रवर्तक, कार्य और कारणके विधायक तथा कर्मफलोंकी प्राप्ति करानेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप कालके ज्ञाता, सबके नियन्ता, गुणोंकी विषमताके उत्पादक तथा प्रजावर्गको जीविका प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! आपको प्रणाम है। भूतभावन! आपको नमस्कार है। कल्याणमय प्रभो! आप हमें दर्शन देनेके लिये प्रसन्नमुख एवं सौम्य हो जायँ।
इस प्रकार देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति होनेपर सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् उमापतिने कहा—'देवताओ! मैं तुम्हें दर्शन देनेको सदा ही प्रसन्नमुख और सौम्य हूँ। तुम शीघ्र कोई वर माँगो। मैं निश्चय ही उसे दूँगा।'
देवता बोले—भगवन्! यह वर आपके ही हाथमें रहे। जब आवश्यकता होगी, तब हम माँग लेंगे। उस समय आप हमें मनोवाञ्छित वर दीजियेगा।
'एवमस्तु' कहकर महादेवजीने देवताओं तथा अन्य लोगोंको विदा किया और स्वयं प्रमथगणोंके साथ अपने धामको चले गये। ब्राह्मणो! जो इस स्तोत्रका श्रवण या पाठ करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें जानेकी शक्ति प्राप्त करता और देवराज इन्द्रकी भाँति देवताओंद्वारा पूजित होता है।
महादेवजी अपने धाममें प्रवेश करके जब सुन्दर आसनपर विराजमान हुए, तब वक्र स्वभाववाले क्रूर कामदेवने उन्हें अपने बाणोंसे बींधनेका विचार किया। वह अनाचारी, दुरात्मा और कुलाधम काम सब लोकोंको पीड़ित करनेवाला है। वह नियम तथा व्रतोंका पालन करनेवाले ऋषियोंके कार्यमें विघ्न डाला करता है। उस दिन चक्रवाकका रूप धारण करके अपनी पत्नी रतिके साथ उसका आगमन हुआ था। देवताओंके स्वामी भगवान् शङ्करने अपनेको बींधनेकी इच्छा रखनेवाले आततायी कामदेवको तीसरे नेत्रसे अवहेलनापूर्वक देखा। फिर तो उनके नेत्रसे प्रकट हुई आग सहस्रों लपटोंके साथ प्रज्वलित हो उठी और रतिके स्वामी मदनको उसके साज-शृङ्गारके साथ सहसा दग्ध करने लगी। उस समय जलता हुआ कामदेव बड़े करुण स्वरमें आर्तनाद करने लगा और भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये धरतीपर गिर पड़ा। इतनेमें उसके सब अङ्गोंमें आग फैल गयी और सब लोकोंको ताप देनेवाला काम स्वयं ही पृथ्वीपर गिरकर क्षणभरमें मूर्च्छित हो गया। उसकी पत्नी