संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९३
समुद्रोंमें क्षीरसागर, मन्त्रोंमें प्रणव, शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य हैं। आप ही इच्छा, राग, द्वेष, मोह, शान्ति, क्षमा, व्यवसाय (दृढ़ निश्चय), धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं। आप गदा, बाण, धनुष, खट्वाङ्ग और मुद्गर धारण करनेवाले हैं। आप ही छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं। नेता और मन्ता (आदर देनेवाले) भी आप ही माने गये हैं। [मनूक्त] दस लक्षणोंवाला धर्म, अर्थ एवं काम भी आपके ही स्वरूप हैं। चन्द्रमा, समुद्र, नदी, छोटा तालाब, सरोवर, लता, बेल, घास, अन्न, पशु, मृग और पक्षी भी आप ही हैं। द्रव्य, कर्म और गुणोंका आरम्भ भी आपसे ही होता है। आप ही समयपर फूल और फल देनेवाले हैं। आदि, अन्त, मध्य, गायत्री और ॐकार भी आप ही हैं।
हरा, लाल, काला, नीला, पीला, अरुण, चितकबरा, कपिल, बभ्रु (भूरा), फाखता और श्याम आदि रंग भी आप ही हैं। आप सुवर्णरेता (अग्नि)-के नामसे विख्यात हैं। आप ही सुवर्ण माने गये हैं। सुवर्ण आपका नाम है और सुवर्ण आपको प्रिय है। आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, वायु, प्रज्वलित अग्नि, स्वर्भानु (राहु) और भानु (सूर्य) हैं। होता (हवन करनेवाले), होत्र (हवन), होम्य (हवनद्वारा पूज्य), हुत (हवि) और प्रभु भी आप ही हैं। त्रिसौपर्ण ऋचा और यजुर्वेदका शतरुद्रिय आपका ही स्वरूप है। आप पवित्रोंमें पवित्र तथा मङ्गलोंके भी मङ्गल हैं। आप ही प्राण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्त्वगुण हैं। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष-निमेष (आँखका खोलना-मीचना), भूख, प्यास तथा जृम्भा (जँभाई) हैं। आप लोहिताङ्ग (लाल शरीरवाले), दंष्ट्री (दाढ़ोंवाले), महावक्त्र (बड़े मुखवाले), महोदर (बड़े पेटवाले), शुचिरोमा (पवित्र रोयेंवाले), हरिच्छ्मश्रु (पीली दाढ़ी-मूँछवाले), ऊर्ध्वकेश (ऊपर उठे हुए केशवाले) तथा चलाचल (स्थावर-जङ्गम) हैं। गीत, वाद्य और नृत्य आपके ही अङ्ग हैं। गाना-बजाना आपको बहुत प्रिय है। आप ही मत्स्य, उसे जीवन देनेवाले जल और उसे फँसानेवाले जाल हैं। आपको कोई जीत नहीं सकता। आप
श्वेतपिङ्गलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च। धर्मकामार्थमोक्षाय क्रथाय क्रथनाय च॥
सांख्याय सांख्यमुख्याय योगाधिपतये नमः। नमो रथ्याधिरथ्याय चतुष्पथपथाय च॥
कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने। ईशान रुद्रसंघात हरिकेश नमोऽस्तु ते॥
त्र्यम्बकायाम्बिकानाथ व्यक्ताव्यक्त नमोऽस्तु ते। कालकामदकामघ्न दुष्टोद्वृत्तनिषूदन॥
सर्वगर्हित सर्वघ्न सद्योजात नमोऽस्तु ते। उन्मादनशतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज॥
चन्द्रार्धसंयुगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते। नमोऽन्नदानकर्त्रे च अन्नदप्रभवे नमः॥
अन्नभोक्त्रे च गोप्त्रे च त्वमेव प्रलयानल। जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजोद्भिज्ज एव च॥
त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः। चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता त्वमेव च॥
त्वमेव ब्रह्मा विश्वेश अप्सु ब्रह्म वदन्ति ते। सर्वस्य परमा योनिः सुधांशो ज्योतिषां निधिः॥
ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः। हायि हायि हरे हायि हुवा हावेति वासकृत्॥
गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठाः सामगा ब्रह्मवादिनः। यजुर्मय ऋङ्मयश्च सामाथर्वयुतस्तथा॥
पठ्यसे ब्रह्मविद्भिस्त्वं कल्पोपनिषदां गणैः। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णाश्रमाश्च ये॥
त्वमेवाश्रमसंघाश्च विद्युत्स्तनितमेव च। संवत्सरस्त्वमृतवो मासा मासार्धमेव च॥
कला काष्ठा निमेषाश्च नक्षत्राणि युगानि च। वृषाणां ककुदं त्वं हि गिरीणां शिखराणि च॥