भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

जलव्याल (पानीमें रहनेवाले साँप) और कुटीचर (एकान्तवासी गृहस्थ) हैं। आप ही विकाल (विपरीत काल), सुकाल, दुष्काल तथा कालनाशक हैं। मृत्यु, अक्षय एवं अन्त भी आप ही हैं। आप क्षमा, माया एवं किरणोंका प्रसार करनेवाले हैं।

आप संवर्त (प्रलयकाल), वर्तक (नित्य विद्यमान), संवर्तक (प्रलयकालीन) और बलाहक (मेघ) हैं। आप घण्टा धारण करनेके कारण घण्टाकी, घण्टकी और घण्टी कहलाते हैं। मस्तकपर चोटी धारण करते हैं। खारे पानीका समुद्र आपका ही स्वरूप है।* आप ब्रह्मा हैं। आपके मुखमें कालाग्निका निवास है। दण्ड धारण करनेवाले, सिर मुँड़ाये रहनेवाले तथा त्रिदण्ड धारण करनेवाले यति आपके ही स्वरूप हैं। चारों युग, चारों वेद, चार प्रकारके होता और चौराहा आप ही हैं। चारों आश्रमोंके नेता और चारों वर्णोंकी उत्पत्ति करनेवाले भी आप ही हैं। क्षर (विनाशी), अक्षर (अविनाशी), प्रिय, धूर्त, गणोंद्वारा गणनीय एवं गणपति भी आप ही हैं।

आप लाल रंगकी माला और वस्त्र धारण करते हैं। पर्वत एवं वाणीके स्वामी हैं। पार्वतीजीके प्रियतम हैं। शिल्पकारोंके स्वामी, शिल्पियोंमें श्रेष्ठ तथा समस्त शिल्पकारोंके प्रवर्तक हैं। आपने ही भगके नेत्रोंका विनाश किया है। आप अत्यन्त क्रोधी हैं। पूषाके दाँत भी आपने ही तोड़े हैं। स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार—सब आप ही हैं। आपको नमस्कार है। आपका व्रत गूढ़ रहता है। आप स्वयं भी गूढ़ हैं तथा गूढ़ व्रतका आचरण करनेवाले महापुरुष सदा आपकी सेवामें रहते हैं। आप ही तरने और तारनेवाले हैं। सब भूतोंमें आप ही संचालकरूपसे स्थित हैं। धाता (धारण करनेवाले), विधाता (विधान करनेवाले), संधाता (जोड़नेवाले), निधाता (बीज डालनेवाले), धारण, धर, तप, ब्रह्म, सत्य, ब्रह्मचर्य तथा आर्जव (सरलता) आपके ही नाम हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, सब भूतोंको उत्पन्न करनेवाले, भूतस्वरूप, भूत, भविष्य तथा वर्तमानके उद्भावक, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक,


* सिंहो मृगाणां च पतिस्तक्षकोऽनन्तभोगिनाम्। क्षीरोदो ह्युदधीनां च मन्त्राणां प्रणवस्तथा॥
वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च। त्वमेवेच्छा च द्वेषश्च रागो मोहः शमः क्षमा॥
व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ। त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाङ्गी मुद्गरी तथा॥
छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता च नेता मन्तासि नो मतः। दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च॥
इन्दुः समुद्रः सरितः पल्वलानि सरांसि च। लतावल्ल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः॥
द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः। आदिश्चान्तश्च मध्यश्च गायत्र्योङ्कार एव च॥
हरितो लोहितः कृष्णो नीलः पीतस्तथारुणः। कद्रुश्च कपिलो बभ्रुः कपोतो मेचकस्तथा॥
सुवर्णरेता विख्यातः सुवर्णश्चाप्यथो मतः। सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च॥
त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः। उत्फुल्लश्चित्रभानुश्च स्वर्भानुर्भानुरेव च॥
होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभुः। त्रिसौपर्णस्तथा ब्रह्मन् यजुषां शतरुद्रियम्॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्। प्राणश्च त्वं रजश्च त्वं तमः सत्त्वयुतस्तथा॥
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च। उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुत्तृड् जृम्भा तथैव च॥
लोहिताङ्गश्च दंष्ट्री च महावक्त्रो महोदरः। शुचिरोमा हरिच्छ्मश्रुरूध्वकेशश्चलाचलः॥
गीतवादित्रनृत्याङ्गो गीतवादनकप्रियः। मत्स्यो जालो जलोऽज्ज्यो जलव्यालः कुटीचरः॥
विकालश्च सुकालश्च दुष्कालः कालनाशनः। मृत्युश्चैवाक्षयोऽन्तश्च क्षमा माया करोत्करः॥
संवर्तो वर्तकश्चैव संवर्तकबलाहकौ। घण्टाकी घण्टकी घण्टी चूडालो लवणोदधिः॥