भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


योग्य हैं, वृषभस्वरूप हैं। आपके नेत्र वृषभके नेत्रोंके समान हैं। आप वृषभके नामसे लोकमें विख्यात हैं। सम्पूर्ण लोक आपका संस्कार (पूजन और अभिषेक) करता है। शिव! चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र, ब्रह्माजी हृदय, अग्निष्टोम शरीर और धर्मकर्म शृङ्गार हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा प्राचीन ऋषि भी आपके माहात्म्यको यथार्थरूपसे जाननेमें समर्थ नहीं हैं। भगवन्! आपकी कल्याणमयी एवं सूक्ष्म जो मूर्तियाँ हैं, उनका मुझे दर्शन हो। आप उन मूर्तियोंके द्वारा मेरी सब ओरसे रक्षा करें—ठीक वैसे ही, जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है। अनघ! आपको नमस्कार है। मैं रक्षा करने योग्य हूँ। आप मेरी रक्षा करें। आप भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदा ही आपमें भक्ति रखता हूँ।

जो खोटी दृष्टि रखनेवाले अनेक सहस्र पुरुषोंको अपनी मायासे आवृत करके अकेले ही समुद्रके भीतर निवास करते हैं, वे भगवान् प्रतिदिन मेरे रक्षक हों। निद्रासे रहित, प्राणोंको वशमें रखनेवाले, सत्त्वगुणमें स्थित, समदर्शी योगिजन योगाभ्यास करते समय जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है। जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण भूतोंको अपना ग्रास बनाकर जलके भीतर शयन करते हैं, उन भगवान् जलशायीकी मैं शरण लेता हूँ। जो रात्रिमें राहुके मुखमें प्रवेश करके चन्द्रमाका अमृत पीते हैं और केतु बनकर सूर्यको भी ग्रस लेते हैं तथा जो अग्नि और सोमस्वरूप हैं, उन भगवान्‌की मैं शरण लेता हूँ। समस्त देहधारियोंकी देहोंमें स्थित, अँगूठेके बराबर आकारवाले जितने भी जीवात्मा हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं; अतः वे सदा मेरी रक्षा करें और सदा मुझे तृप्त बनाये रखें। जो अभी उत्पन्न नहीं हुए हैं तथा जो जलके भीतर स्थित हैं, उन सब गर्भोको जिनसे स्वाहा (पुष्टि) प्राप्त होती है तथा जिनकी कृपासे उन्हें स्वधा (स्वादिष्ट रस)-का आस्वादन सुलभ होता है, जो शरीरके भीतर रहकर स्वयं नहीं रोते और प्राणियोंको रुलाते हैं, जो सबको हर्ष प्रदान करते, किंतु स्वयं हर्षका अनुभव नहीं करते, उन सबको शिवरूपमें सदा-सर्वदा नमस्कार है।

जो समुद्र, नदी, दुर्गम स्थान, पर्वत, गुफा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, अगम्य पथ, गहन वन, चौराहा, सड़क, सभा, गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, प्राचीन वाटिका, पुराने घर, पाँचों भूत, दिशा, विदिशा, इन्द्र और सूर्यके मध्य, चन्द्रमा और सूर्यकी किरण तथा रसातलमें जो शिवस्वरूप जीव रहते हैं और उन स्थानोंसे परे जिनकी स्थिति है, उन सबको सब प्रकारसे नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।* भगवन्! आप सर्वस्वरूप, सर्वव्यापी देवता, सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी, सबकी


* विषपोऽमृतपश्चैव सुरापः क्षीरसोमपः। मधुपश्चापपश्चैव सर्वपश्च बलाबलः ॥
वृषाङ्गवाह्यो वृषभस्तथा वृषभलोचनः। वृषभश्चैव विख्यातो लोकानां लोकसंस्कृतः ॥
चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामहः। अग्निष्टोमस्तथा देहो धर्मकर्मप्रसाधितः ॥
न ब्रह्मा न च गोविन्दः पुराणऋषयो न च। माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन ते शिव ॥
शिवा या मूर्तयः सूक्ष्मास्ते मह्यं यान्तु दर्शनम्। ताभिर्मां सर्वतो रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम् ॥
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते। भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ॥
यः सहस्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्द्दृशाम्। तिष्ठत्येकः समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यशः ॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः। ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥
सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते समुपस्थिते। यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ॥

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