संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 99, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९७
उत्पत्तिके कारण तथा सम्पूर्ण भूतोंके अन्तरात्मा हैं। इसीलिये आपको पृथक् निमन्त्रित नहीं किया गया। देव! भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा आपका ही यजन किया जाता है। आप ही सबके कर्ता-धर्ता हैं, इसलिये आपको मैंने निमन्त्रित नहीं किया। अथवा देव! आपकी सूक्ष्म—दुर्बोध मायासे मैं मोहित था। इसी कारण आपको निमन्त्रण नहीं दिया। देवेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। आप ही मुझे शरण देनेवाले हैं। आप ही मेरी गति और प्रतिष्ठा हैं, दूसरा कोई नहीं है। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।*
इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तब भगवान् शिवने कहा—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्ष! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। अधिक कहनेसे क्या लाभ, तुम्हें मेरा सामीप्य प्राप्त होगा।' यों कहकर देवेश्वर महादेवजी अपनी पत्नी और पार्षदोंके साथ अमित तेजस्वी दक्षकी दृष्टिसे ओझल हो गये। जो मनुष्य दक्षद्वारा किये हुए इस स्तोत्रका श्रवण या कीर्तन करता है, उसका तनिक भी अमङ्गल नहीं होता। उसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। जैसे सम्पूर्ण देवताओंमें भगवान् शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब स्तोत्रोंमें यह दक्षनिर्मित स्तोत्र श्रेष्ठ है। जो लोग यश, स्वर्ग, देवताओंका ऐश्वर्य, धन, विजय और विद्या आदिकी अभिलाषा रखते हैं, उन्हें यत्नपूर्वक भक्तिके साथ इस स्तोत्रद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति करनी चाहिये। रोगी, दुःखी, दीन, भय आदिसे ग्रस्त तथा राज-काजमें नियुक्त मनुष्य इस स्तोत्रके प्रभावसे महान् भयसे मुक्त हो जाता है तथा भगवान् शिवसे इस लोकमें सुख पाकर उसी शरीरसे गणोंका स्वामी बन जाता है। यक्ष, पिशाच, नाग और विनायक उस मनुष्यके घरमें विघ्न नहीं डालते, जिसके यहाँ भगवान् शिवकी स्तुति होती है। दक्षद्वारा किये हुए इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेके बाद देवताओंद्वारा पूजित होता है। इस परम गोपनीय स्तोत्रका श्रवण करके पापयोनिवाले मनुष्य तथा वैश्य, स्त्री एवं शूद्र भी रुद्रलोक प्राप्त करते हैं। जो द्विज प्रत्येक पर्वमें ब्राह्मणोंको सदा इस स्तोत्रका श्रवण कराता है, वह निःसंदेह भगवान् शिवके लोकमें जाता है।
प्रविश्य वदनं राहोर्यः सोमं पिबते निशि। ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा सोमाग्निरेव च॥
अङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम्। रक्षन्तु ते च मां नित्यं नित्यं चाप्याययन्तु माम्॥
येनाप्युत्पादिता गर्भा अपो भागगताश्च ये। तेषां स्वाहा स्वधा चैव आप्नुवन्ति स्वदन्ति च॥
ये न रोदन्ति देहस्थाः प्राणिनो रोदयन्ति च। हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्यस्तु नित्यशः॥
ये समुद्रे नदीदुर्गे पर्वतेषु गुहासु च। वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च॥
चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च। हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥
ये तु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च। इन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥
रसातलगता ये च ये च तस्मात्परं गताः। नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यस्तु सर्वशः॥
* सर्वस्त्वं सर्वगो देवः सर्वभूतपतिर्भवः। सर्वभूतान्तरात्मा च तेन त्वं न निमन्त्रितः॥
त्वमेव चेज्यसे देव यज्ञैर्विविधदक्षिणैः। त्वमेव कर्ता सर्वस्य तेन त्वं न निमन्त्रितः॥
अथवा मायया देव मोहितः सूक्ष्मया तव। तस्मात्तु कारणाद्वापि त्वं मया न निमन्त्रितः॥
प्रसीद मम देवेश त्वमेव शरणं मम। त्वं गतिस्त्वं प्रतिष्ठा च न चान्योऽस्तीति मे मतिः॥
(४०।३—१००)