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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

११२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

मुझे दूसरोंने मारा और मेरे हाथसे दूसरे मारे गये। मुझे दूसरोंने मरवाया और मैंने भी दूसरोंकी हत्या करवायी। मुझे दूसरोंने और मैंने दूसरोंको अनेकों बार दान दिये हैं। जनार्दन! पिता, माता, सुहृद्, भाई और पत्नीके लिये मैंने लज्जा छोड़कर धनियों, श्रोत्रियों, दरिद्रों और तपस्वियोंके सामने दीनतासे भरी बातें की हैं। प्रभो! देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य तथा अन्य स्थावर-जङ्गम भूतोंमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ मेरा जाना न हुआ हो। जगत्पते! कभी नरकमें और कभी स्वर्गमें मेरा निवास रहा है। कभी मनुष्यलोकमें और कभी तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेना पड़ा है। सुरश्रेष्ठ! जैसे रहटमें रस्सीसे बँधी हुई घटी कभी ऊपर जाती, कभी नीचे आती और कभी बीचमें ठहरी रहती है, उसी प्रकार मैं कर्मरूपी रज्जुमें बँधकर दैवयोगसे ऊपर, नीचे तथा मध्यवर्ती लोकमें भटकता रहता हूँ। इस प्रकार यह संसार-चक्र बड़ा ही भयानक एवं रोमाञ्चकारी है। मैं इसमें दीर्घकालसे घूम रहा हूँ, किंतु कभी इसका अन्त नहीं दिखायी देता। समझमें नहीं आता, अब क्या करूँ। हरे! हमारी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी हैं। मैं शोक और तृष्णासे आक्रान्त होकर अब कहाँ जाऊँ। मेरी चेतना लुप्त हो रही है। देव! इस समय व्याकुल होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। कृष्ण! मैं संसार-समुद्रमें डूबकर दुःख भोगता हूँ। मुझे बचाइये। जगन्नाथ! यदि आप मुझे अपना भक्त मानते हैं तो मुझपर कृपा कीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा बन्धु नहीं है, जो मेरी चिन्ता करेगा। देव! प्रभो! आप-जैसे स्वामीकी शरणमें आकर अब मुझे जीवन, मरण अथवा योगक्षेमके लिये कहीं भी भय नहीं होता। देव! जो नराधम आपकी विधिपूर्वक पूजा नहीं करते, उनकी इस संसार-बन्धनसे मुक्ति एवं सद्गति कैसे हो सकती है। जगदाधार भगवान् केशवमें जिनकी भक्ति नहीं होती, उनके कुल, शील, विद्या और जीवनसे क्या लाभ है। जो आसुरी प्रकृतिका आश्रय ले विवेकशून्य हो आपकी निन्दा करते हैं, वे बारंबार जन्म लेकर घोर नरकमें पड़ते हैं तथा उस नरक-समुद्रसे उनका कभी उद्धार नहीं होता। देव! जो दुराचारी नीच पुरुष आपपर दोषारोपण करते हैं, वे कभी नरकसे छुटकारा नहीं पाते। हरे! अपने कर्मोंमें बँधे रहनेके कारण मेरा जहाँ कहीं भी जन्म हो, वहाँ सर्वदा आपमें मेरी दृढ़ भक्ति बनी रहे। देव! आपकी आराधना करके देवता, दैत्य, मनुष्य तथा अन्य संयमी पुरुषोंने परम सिद्धि प्राप्त की है; फिर कौन आपकी पूजा न करेगा। भगवन्! ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, फिर मानव-बुद्धि लेकर मैं आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ। क्योंकि आप प्रकृतिसे परे परमेश्वर हैं। प्रभो! मैंने अज्ञानके भावसे आपकी स्तुति की है। यदि आपकी मुझपर दया हो तो मेरे इस अपराधको क्षमा करें। हरे! साधु पुरुष अपराधीपर भी क्षमाभाव ही रखते हैं, अतः देवेश्वर! आप भक्तस्नेहके वशीभूत होकर मुझपर


कृमिकीटद्रुमाणां च हस्त्यश्वमृगपक्षिणाम्। महिषोष्ट्रगवां चैव तथान्येषां वनौकसाम्॥
द्विजातीनां च सर्वेषां शूद्राणां चैव योनिषु। धनिनां क्षत्रियाणां च दरिद्राणां तपस्विनाम्॥
नृपाणां नृपभृत्यानां तथान्येषां च देहिनाम्। गृहेषु तेषामुत्पन्नो देव चाहं पुनः पुनः॥
गतोऽस्मि दासतां नाथ भृत्यानां बहुशो नृणाम्। दरिद्रत्वं चेश्वरत्वं स्वामित्वं च तथा गतः॥
(४९। २३-३८)

  • राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी स्तुति * ११३

प्रसन्न होइये। देव! मैंने भक्तिभावित चित्तसे आपकी जो स्तुति की है, वह साङ्गोपाङ्ग सफल हो। वासुदेव! आपको नमस्कार है।'*

**ब्रह्माजी कहते हैं—**राजा इन्द्रद्युम्नके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् गरुड़ध्वजने प्रसन्न होकर उनका सब मनोरथ पूर्ण किया। जो मनुष्य भगवान् जगन्नाथका पूजन करके प्रतिदिन इस स्तोत्रसे उनका स्तवन करता है, वह बुद्धिमान् निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो विद्वान् पुरुष तीनों संध्याओंके समय पवित्र हो इस श्रेष्ठ स्तोत्रका जप करता है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पाता है। जो एकाग्रचित्त हो इसका पाठ या श्रवण करता अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह पापरहित हो भगवान् विष्णुके सनातन धाममें जाता है। यह स्तोत्र परम प्रशंसनीय, पापोंको दूर करनेवाला, भोग एवं मोक्ष देनेवाला, कल्याणमय, गोपनीय, अत्यन्त दुर्लभ तथा पवित्र है। इसे जिस किसी मनुष्यको नहीं देना चाहिये। नास्तिक, मूर्ख, कृतघ्न, मानी, दुष्टबुद्धि तथा अभक्त मनुष्यको कभी इसका उपदेश न दे। जिसके हृदयमें भक्ति हो, जो गुणवान्, शीलवान्, विष्णुभक्त, शान्त तथा श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करनेवाला हो, उसीको इसका उपदेश देना चाहिये।

जो निर्मल हृदयवाले मनुष्य उन परम सूक्ष्म नित्य पुराणपुरुष मुरारि श्रीविष्णुभगवान्‌का ध्यान करते हैं, वे मुक्तिके भागी हो भगवान् विष्णुमें प्रवेश कर जाते हैं—ठीक उसी तरह, जैसे मन्त्रोंद्वारा यज्ञाग्निमें हवन किया हुआ हविष्य भगवान् विष्णुको प्राप्त होता है। एकमात्र वे


* हतो मया हताश्चान्ये घातितो घातितास्तथा। दत्तं ममान्यैरन्येभ्यो मया दत्तमनेकशः॥
पितृमातृसुहृद्भ्रातृकलत्राणां कृतेन च। धनिनां श्रोत्रियाणां च दरिद्राणां तपस्विनाम्॥
उक्तं दैन्यं च विविधं त्यक्त्वा लज्जां जनार्दन। देवतिर्यङ्मनुष्येषु स्थावरेषु चरेषु च॥
न विद्यते तथा स्थानं यत्राहं न गतः प्रभो। कदा मे नरके वासः कदा स्वर्गे जगत्पते॥
कदा मनुष्यलोकेषु कदा तिर्यग्गतेषु च। जलयन्त्रे यथा चक्रे घटी रज्जुनिबन्धना॥
याति चोर्ध्वमधश्चैव कदा मध्ये च तिष्ठति। तथा चाहं सुरश्रेष्ठ कर्मरज्जुसमावृतः॥
अधश्चोर्ध्वं तथा मध्ये भ्रमन् गच्छामि योगतः। एवं संसारचक्रेऽस्मिन् भैरवे रोमहर्षणे॥
भ्रमामि सुचिरं कालं नान्तं पश्यामि कर्हिचित्। न जाने किं करोम्यद्य हरे व्याकुलितेन्द्रियः॥
शोकतृष्णाभिभूतोऽहं कांदिशीको विचेतनः। इदानीं त्वामहं देव विह्वलः शरणं गतः॥
त्राहि मां दुःखितं कृष्ण मग्नं संसारसागरे। कृपां कुरु जगन्नाथ भक्तं मां यदि मन्यसे॥
त्वदृते नास्ति मे बन्धुर्योऽसौ चिन्तां करिष्यति। देव त्वां नाथमासाद्य न भयं मेऽस्ति कुत्रचित्॥
जीविते मरणे चैव योगक्षेमेऽथवा प्रभो। ये तु त्वां विधिवद्देव नार्चयन्ति नराधमाः॥
सुगतिस्तु कथं तेषां भवेत्संसारबन्धनात्। किं तेषां कुलशीलेन विद्यया जीवितेन च॥
येषां न जायते भक्तिर्जगद्धातरि केशवे। प्रकृतिं त्वासुरीं प्राप्य ये त्वां निन्दन्ति मोहिताः॥
पतन्ति नरके घोरे जायमानाः पुनः पुनः। न तेषां निष्कृतिस्तस्माद्विद्यते नरकार्णवात्॥
ये दूषयन्ति दुर्वृत्तास्त्वां देव पुरुषाधमाः। यत्र यत्र भवेज्जन्म मम कर्मनिबन्धनात्॥
तत्र तत्र हरे भक्तिस्त्वयि चास्तु दृढा सदा। आराध्य त्वां सुरा दैत्या नराश्चान्येऽपि संयताः॥
अवापुः परमां सिद्धिं कस्त्वां देव न पूजयेत्। न शक्नुवन्ति ब्रह्माद्याः स्तोतुं त्वां त्रिदशा हरे॥
कथं मानुषबुद्ध्याहं स्तौमि त्वां प्रकृतेः परम्। तथा चाज्ञानभावेन संस्तुतोऽसि मया प्रभो॥
तत्क्षमस्वापराधं मे यदि तेऽस्ति दया मयि। कृतापराधेऽपि हरे क्षमां कुर्वन्ति साधवः॥
तस्मात्प्रसीद देवेश भक्तस्नेहं समाश्रितः। स्तुतोऽसि यन्मया देव भक्तिभावेन चेतसा।
साङ्गं भवतु तत्सर्वं वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ (४९। ३९–५९)

२९- राजाको स्वप्नमें और प्रत्यक्ष भी भगवान्का दर्शन, भगवत्प्रतिमाओंका निर्माण, स्थापन और यात्राकी महिमा

११४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

देवदेव भगवान् विष्णु ही संसारके दुःखोंका नाश करनेवाले तथा परोंसे भी पर हैं। उनसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता नहीं है। वे ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। वे ही समस्त संसारमें सारभूत हैं। मोक्ष-सुख देनेवाले जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णमें यहाँ जिनकी भक्ति नहीं होती, उन्हें विद्यासे, अपने गुणोंसे तथा यज्ञ, दान और कठोर तपस्यासे क्या लाभ हुआ। जिस पुरुषकी भगवान् पुरुषोत्तमके प्रति भक्ति है, वही संसारमें धन्य, पवित्र और विद्वान् है। वही, यज्ञ, तपस्या और गुणोंके कारण श्रेष्ठ है तथा वही ज्ञानी, दानी और सत्यवादी है।*


राजाको स्वप्नमें और प्रत्यक्ष भी भगवान्‌का दर्शन, भगवत्प्रतिमाओंका निर्माण, स्थापन और यात्राकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मुनिवरो! इस प्रकार स्तुति करके राजाने समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले सनातन पुरुष जगन्नाथ भगवान् वासुदेवको प्रणाम किया और चिन्तामग्न हो पृथ्वीपर कुश और वस्त्र बिछाकर भगवान्‌का चिन्तन करते हुए वे उसीपर सो गये। सोते समय उनके मनमें यही संकल्प था कि सबकी पीड़ा दूर करनेवाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन कैसे मुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। सो जानेपर देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् वासुदेवने राजाको स्वप्नमें अपने शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले स्वरूपका दर्शन कराया। राजा इन्द्रद्युम्नने बड़े प्रेमसे भगवान्‌का दर्शन किया। वे शङ्ख और चक्र धारण किये हुए थे। उन्होंने शार्ङ्ग नामक धनुष और बाण भी धारण कर रखे थे। उनका स्वरूप प्रलयकालीन सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा था। वे प्रज्वलित तेजके विशाल मण्डल प्रतीत होते थे। उनका श्रीअङ्ग नीले पुखराजके समान श्याम था। वे गरुड़के कंधेपर विराजमान थे और उनके आठ भुजाएँ शोभा पा रही थीं। दर्शन देकर भगवान्ने उनसे कहा—'राजन्! तुम्हें साधुवाद है। तुम्हारे इस दिव्य यज्ञसे, भक्तिसे और श्रद्धासे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। महीपाल! तुम व्यर्थ क्यों


* ये तं सुसूक्ष्मं विमलं मुरारिं ध्यायन्ति नित्यं पुरुषं पुराणम्। ते मुक्तिभाजः प्रविशन्ति विष्णुं मन्त्रैर्यथाऽऽज्यं हुतमध्वराग्नौ॥
एकः स देवो भवदुःखहन्ता परं परेषां न ततोऽस्ति चान्यत्। स्रष्टा स पाता स तु नाशकर्ता विष्णुः समस्ताखिलसारभूतः॥
किं विद्यया किं स्वगुणैश्च तेषां यज्ञैश्च दानैश्च तपोभिरुग्रैः। येषां न भक्तिर्भवतीह कृष्णे जगद्गुरौ मोक्षसुखप्रदे च॥
लोके स धन्यः स शुचिः स विद्वान्मखैस्तपोभिः स गुणैर्वरिष्ठः। ज्ञाता स दाता स तु सत्यवक्ता यस्यास्ति भक्तिः पुरुषोत्तमाख्ये॥
(४९। ६८—७१)

  • राजाको स्वप्नमें और प्रत्यक्ष भी भगवान्‌का दर्शन, भगवत्प्रतिमाओंका निर्माण * ११५

सोचमें पड़े हो। राजन्! यहाँ जो जगत्पूज्य सनातनी प्रतिमा है, उसकी प्राप्तिका उपाय तुम्हें बतलाता हूँ। आजकी रात बीतनेपर निर्मल प्रभातमें जब सूर्योदय हो, उस समय अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित समुद्रके जलप्रान्तमें, जहाँ तरङ्गोंसे प्रेरित महान् जलकी राशि दिखायी देती है, वहीं एक बहुत बड़ा वृक्ष खड़ा है, जिसका कुछ भाग तो जलमें है और कुछ स्थलमें है। वह समुद्रकी लहरोंसे आहत होनेपर भी कम्पित नहीं होता। तुम हाथमें कुल्हाड़ी लेकर लहरोंके बीचसे अकेले ही वहाँ चले जाना। तुम्हें वह वृक्ष दिखायी देगा। मेरे बताये अनुसार उसको पहचानकर निःशङ्कभावसे उस वृक्षको काट डालना। उसे काटते समय तुम्हें कोई अद्भुत वस्तु दिखायी देगी। उसीसे सोच-विचारकर तुम दिव्य प्रतिमाका निर्माण करो। मोहमें डालनेवाली चिन्ता छोड़ दो।'

यों कहकर महाभाग श्रीहरि अदृश्य हो गये। वह स्वप्न देखकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उस रात्रिको देखते हुए वे भगवान्‌में मन लगा उठ बैठे और वैष्णव मन्त्र एवं विष्णुसूक्तका जप करने लगे। प्रातःकाल उठे और भगवत्स्मरण करते हुए विधिपूर्वक उन्होंने समुद्रमें स्नान किया। फिर ब्राह्मणोंको नगर और गाँव आदि दानमें दे पूर्वाह्न-कृत्य करके समुद्रके तटपर गये। वहाँ अकेले ही महाराजने समुद्रकी महावेलामें प्रवेश किया और उस तेजस्वी महावृक्षको देखा। वह बहुत ऊँचा था और उससे बड़ी-बड़ी जटाएँ लटक रही थीं। उसे देखकर राजा इन्द्रद्युम्न बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने तीखे फरसेसे उस वृक्षको काट गिराया और उसके दो टुकड़े करनेका विचार किया। फिर उन्होंने जब काष्ठका भलीभाँति निरीक्षण किया, तब एक अद्भुत बात दिखायी दी। विश्वकर्मा और भगवान् विष्णु दोनों ब्राह्मणका रूप धरकर वहाँ आये। उनके कण्ठमें दिव्य हार और शरीरमें दिव्य अङ्गराग शोभा पा रहे थे। वे दोनों अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। राजाके पास आकर उन्होंने पूछा—'महाराज! आप यहाँ कौन-सा कार्य करेंगे? किसलिये इस वनस्पतिको काट गिराया है?'

उन दोनोंकी बात सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने मीठी वाणीमें उत्तर दिया—'मैं यहाँ आदि-अन्तसे रहित देवाधिदेव जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी आराधनाके लिये प्रतिमा बनवाना चाहता हूँ। इसके लिये स्वयं भगवान्‌ने ही मुझे स्वप्नमें प्रेरित किया है।' राजाकी यह बात सुनकर भगवान् जगन्नाथने हँसकर कहा—'महाराज! आपका विचार बड़ा उत्तम है। इसके लिये आपको साधुवाद है। यह भयंकर संसार-सागर केलेके पत्तेकी भाँति सारहीन है। इसमें दुःखकी ही अधिकता है। काम-क्रोध इसमें पूर्णरूपसे व्याप्त हैं। भँवर और कीचड़के कारण यह दुस्तर है। नाना प्रकारके सैकड़ों रोग यहाँ भँवरके समान हैं। यह संसार पानीके बुलबुलेकी भाँति क्षणभङ्गुर है। इसमें रहते हुए जो आपके मनमें भगवान् विष्णुकी आराधनाका विचार उत्पन्न हुआ, यह बहुत ही उत्तम है। महाभाग! आइये, इस वृक्षकी शीतल छायामें हम दोनोंके साथ बैठिये। ये मेरे साथी एक श्रेष्ठ शिल्पी हैं। ये सब प्रकारके शिल्प-कर्ममें साक्षात् विश्वकर्माके समान निपुण हैं। आप किनारा छोड़कर चले आइये। ये मेरे बताये अनुसार प्रतिमा तैयार कर देंगे।'

ब्राह्मणकी बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न समुद्रका तट छोड़ उनके पास चले गये और वृक्षकी शीतल छायामें बैठे। तदनन्तर ब्राह्मणरूपधारी विश्वात्मा भगवान्‌ने शिल्पियोंमें प्रधान विश्वकर्माको आज्ञा दी—'तुम प्रतिमा बनाओ। भगवान् श्रीकृष्णका

११६

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

रूप परम शान्त हो। उनके नेत्र पद्मपत्रके समान विशाल होने चाहिये। वे वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणि और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये हुए हों। दूसरी प्रतिमाका विग्रह दुग्धके समान गौरवर्ण हो। उसमें स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये। वे अपने हाथमें हल धारण किये हुए हों, उनका नाम महाबली अनन्त (बलरामजी) होगा। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, विद्याधर और नाग—कोई भी उनका अन्त नहीं जानते; इसलिये वे भगवान् अनन्त कहलाते हैं। तीसरी प्रतिमा भगवान् वासुदेवकी बहन सुभद्रादेवीकी होगी। उनके शरीरका रंग सुवर्णके समान गौर एवं सुन्दर शोभासे युक्त होना चाहिये। उनमें समस्त शुभ लक्षणोंका समावेश होना आवश्यक है।'

भगवान्‌का यह कथन सुनकर उत्तम कर्म करनेवाले विश्वकर्माने तत्काल उत्तम लक्षणोंसे युक्त प्रतिमाएँ तैयार कर दीं। पहले उन्होंने बलभद्रजीकी मूर्ति बनायी। उनका वर्ण शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति श्वेत था। नेत्रोंमें कुछ-कुछ लालिमा थी। उनका शरीर विशाल और मस्तक फणाकार होनेसे विकट जान पड़ता था। वे नील वस्त्र धारण किये बलके अभिमानसे उद्धत प्रतीत होते थे। उन्होंने एक कुण्डल धारण कर रखा था। उनके हाथोंमें गदा और मूसल शोभा पाते थे। उनका स्वरूप दिव्य था। द्वितीय विग्रह साक्षात् भगवान् वासुदेवका था। उनके नेत्र कमलके समान प्रफुल्लित थे। शरीरकी कान्ति नील मेघके समान श्याम थी। उनकी श्याम आभा तीसीके फूलकी-सी प्रतीत होती थी। बड़े-बड़े नेत्र कमल-पत्रकी उपमा धारण करते थे। शरीरपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न तथा हाथमें चक्र था। इस प्रकार वे सर्वपापहारी श्रीहरि बड़े दिव्य दिखायी देते थे। तीसरी प्रतिमा सुभद्राकी थी, जिनके देहकी दिव्य कान्ति सोनेकी-सी दमक रही थी। नेत्र कमलपत्रके समान विशाल थे। उनका अङ्ग विचित्र वस्त्रसे आच्छादित था। वे हार और केयूर आदि विचित्र आभूषणोंसे सुशोभित थीं। गलेमें रत्नमय हार लटक रहा था। इस प्रकार विश्वकर्माने उनकी बड़ी रमणीय प्रतिमा बनायी। राजा इन्द्रद्युम्नने यह बड़ी ही अद्भुत बात देखी। सब प्रतिमाएँ एक ही क्षणमें बन गयीं। सभी दो दिव्य वस्त्रोंसे आच्छादित थीं। सबका भाँति-भाँतिके रत्नोंसे शृङ्गार किया गया था और सभी अत्यन्त मनोहर एवं समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं। उन्हें देखकर राजा अत्यन्त आश्चर्यमग्न होकर बोले—'आप दोनों ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् देवता तो नहीं पधारे हैं? आप दोनोंके कर्म अद्भुत हैं। आपके व्यवहार देवताओंके-से हैं। निश्चय ही आप मनुष्य नहीं जान पड़ते। आप देवता हैं या मनुष्य? यक्ष हैं अथवा विद्याधर! आप ब्रह्मा और विष्णु तो नहीं हैं? दोनों अश्विनीकुमार तो नहीं हैं? आप मायामयरूपसे स्थित हैं। अतः आपके यथार्थ स्वरूपको मैं नहीं जानता। अब आप ही दोनोंकी शरणमें आया हूँ। मेरे सामने अपने स्वरूपको प्रकाशित कीजिये।'

**श्रीभगवान् बोले—**मैं देवता, यक्ष, दैत्य, देवराज इन्द्र, ब्रह्मा अथवा रुद्र नहीं हूँ। मुझे पुरुषोत्तम समझो। मैं समस्त लोकोंकी पीड़ा दूर करनेवाला अनन्त बल-पौरुषसे सम्पन्न और सम्पूर्ण भूतोंका आराध्य हूँ। मेरा कभी अन्त नहीं होता। जिसका सब शास्त्रोंमें उल्लेख किया जाता है, वेदान्त-ग्रन्थोंमें वर्णन मिलता है, जिसे योगीजन ज्ञानगम्य एवं वासुदेव कहते हैं, वह परमात्मा मैं ही हूँ। स्वयं मैं ही ब्रह्मा, मैं ही विष्णु, मैं ही शिव, मैं

* राजाको स्वप्नमें और प्रत्यक्ष भी भगवान्‌का दर्शन, भगवत्प्रतिमाओंका निर्माण * ११७


ही देवराज इन्द्र तथा मैं ही जगत्‌का नियन्त्रण करनेवाला यम हूँ। पृथ्वी आदि पाँच भूत, त्रिविध अग्नि, जलाधिप वरुण, धरती और पर्वत भी मैं ही हूँ। संसारमें जो कुछ भी वाणीसे कहा जानेवाला स्थावर-जङ्गम भूत है, वह मेरा ही स्वरूप है। यह चराचर विश्व मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। नृपश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। सुव्रत! मुझसे वर माँगो। तुम्हारे हृदयमें जो अभीष्ट वस्तु हो, वह तुम्हें दूँगा। जो पुण्यवान् नहीं हैं, उनको स्वप्नमें भी मेरा दर्शन नहीं होता। तुम्हारी तो मुझमें दृढ़ भक्ति है, इसलिये तुमने मेरा प्रत्यक्ष दर्शन किया है।

भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर राजाके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे इस प्रकार स्तोत्र-गान करने लगे—'लक्ष्मीकान्त! आपको नमस्कार है। श्रीपते! आपके दिव्य विग्रहपर पीत वस्त्र शोभा पाता है। आप लक्ष्मी प्रदान करनेवाले और लक्ष्मीके स्वामी हैं। श्रीनिवास! आप लक्ष्मीके धाम हैं, आपको नमस्कार है। आप आदिपुरुष, ईशान, सबके ईश्वर, सब ओर मुखवाले, निष्कल एवं सनातन परम देव हैं; आपको मेरा प्रणाम है। आप शब्द और गुणोंसे अतीत, भाव और अभावसे रहित, निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, सर्वज्ञ तथा सबके रक्षक हैं। आपका स्वरूप वर्षाकालके मेघके समान श्याम है। आप गौ तथा ब्राह्मणोंके हितमें संलग्न रहते हैं। सबकी रक्षा करते हैं। सर्वत्र व्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं। आप शङ्ख, चक्र, गदा और मूसल धारण करनेवाले देवता हैं। आपके श्रीअङ्गोंकी सुषमा नील कमलदलके समान श्याम है। आप क्षीरसागरके भीतर शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं। इन्द्रियोंके नियन्ता, सर्वपापहारी श्रीहरि हैं। आपको नमस्कार करता हूँ। आप देवदेवेश्वर, वरदाता, व्यापक, सर्वलोकेश्वर, मोक्षके साधक तथा अविनाशी भगवान् विष्णु हैं; आपको पुनः मेरा प्रणाम है।'

इस प्रकार भगवान्‌का स्तवन करके राजाने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और धरतीपर मस्तक टेककर कहा—'नाथ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यह उत्तम वर माँगता हूँ—देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, महानाग, सिद्ध, विद्याधर, साध्य, किंनर, गुह्यक, महाभाग ऋषि, नाना शास्त्रोंके प्रवीण विद्वान्, संन्यासी, योगी, वेदतत्त्वका विचार करनेवाले तथा अन्यान्य मोक्षमार्गके ज्ञाता मनीषी पुरुष जिस निर्गुण, निर्मल, एवं शान्त परम पदका ध्यान करते हैं, उस परम दुर्लभ पदको मैं आपके प्रसादसे प्राप्त करना चाहता हूँ।'

श्रीभगवान् बोले—राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, सब कुछ तुम्हारी इच्छाके अनुसार होगा। मेरे प्रसादसे तुम्हें अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति होगी। नृपश्रेष्ठ! तुम दस हजार नौ सौ वर्षोंतक अपने अखण्ड साम्राज्यका उपभोग करो। इसके बाद उस दिव्य पदको प्राप्त होओगे, जो देवता और असुरोंके लिये भी दुर्लभ है, जिसे पाकर सब मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो शान्त, गूढ़, अव्यक्त, अव्यय, परसे भी पर, सूक्ष्म, निर्लेप, निष्कल, ध्रुव, चिन्ता और शोकसे मुक्त तथा कार्य और कारणसे वर्जित ज्ञेय नामक परम पद है, उसका तुम्हें साक्षात्कार कराऊँगा। उस परमानन्दमय पदको पाकर तुम परम पद—मोक्षको प्राप्त हो जाओगे! राजेन्द्र! इस पृथ्वीपर जबतक बादल पानी बरसाते रहेंगे, जबतक आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और तारे दीखते रहेंगे, जबतक सात समुद्र तथा मेरु आदि पर्वत मौजूद रहेंगे तथा जबतक द्युलोकमें देवताओंकी सत्ता बनी रहेगी, तबतक

५०- पुरुषोत्तमधामकी झाँकी

११८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

इस भूतलपर सर्वत्र तुम्हारी अक्षय कीर्ति छायी रहेगी। तुम्हारे यज्ञाङ्गसे प्रकट होनेवाला तालाब इन्द्रद्युम्नसरोवरके नामसे प्रसिद्ध तीर्थ होगा, जिसमें एक बार स्नान करके भी मनुष्य इन्द्रलोक प्राप्त कर सकते हैं। जो इस सरोवरके सुन्दर तटपर पिण्डदान करेगा, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके इन्द्रलोकको जायगा और वहाँ विमानपर बैठकर अप्सराओंसे पूजित हो गन्धर्वोंके गीत सुनता हुआ चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त निवास करेगा। सरोवरके दक्षिण भागमें नैर्ऋत्य कोणकी ओर जो बरगदका वृक्ष खड़ा है, उसके समीप केवड़ेके वनसे आच्छादित एक मण्डप है, जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त है। आषाढ़के शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको महानक्षत्रमें हमारी इन प्रतिमाओंको ले आकर लोग सात दिनोंतक मण्डपमें स्थापित रखेंगे। उस समय बड़ा उत्सव होगा। सोनेके दण्ड लगे हुए चँवर तथा रत्नभूषित व्यजनोंद्वारा सब लोग हमें हवा करेंगे। इस प्रकार मङ्गलपाठपूर्वक हमारी स्थापना होगी। ब्रह्मचारी, संन्यासी, स्नातक, वानप्रस्थ, गृहस्थ, सिद्ध तथा अन्य ब्राह्मण नाना प्रकारके पदोंवाले स्तोत्रों तथा ऋक्, यजु एवं सामवेदकी ध्वनिसे बलराम और श्रीकृष्णकी स्तुति करेंगे। उस समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन, दर्शन अथवा नमन करेगा, वह श्रीहरिके शोभामय धाममें विराजेगा।

इस प्रकार राजाको वरदान दे विश्वकर्मासहित भगवान् विष्णु वहाँसे अन्तर्धान हो गये। राजाके हर्षकी सीमा न रही। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। उन्होंने भगवान्‌के दर्शनसे अपनेको कृतकृत्य माना। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, बलराम और वरदायिनी सुभद्राको मणिकाञ्चनजटित विमानाकार रथोंमें बिठाकर वे बुद्धिमान् नरेश अमात्य और मन्त्रियोंसहित मङ्गलपाठ तथा बाजे-गाजेके साथ ले आये और उन्हें परम मनोहर पवित्र स्थानमें पधराया। फिर शुभ तिथि, शुभ समय, शुभ नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें ब्राह्मणोंके द्वारा उनकी प्रतिष्ठा करायी। उत्तम प्रासादमें वेदोक्त विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करके उन सब विग्रहोंको स्थापित किया; फिर भाँति-भाँतिके सुगन्धित पुष्पोंसे विधिवत् पूजा करके सुवर्ण, मणि, मोती और नाना प्रकारके सुन्दर वस्त्र अर्पण किये। विविध प्रकारके दिव्य रत्न, आसन, ग्राम, नगर, राज्य तथा पुर आदि भी दान किये। इस तरह अनेक प्रकारका दान करके राजाने समुचित रीतिसे राज्य किया और भाँति-भाँतिके यज्ञ करके अनेक बार दान दिये। फिर कृतकृत्य होकर राजाने समस्त परिग्रहोंका त्याग कर दिया और अत्यन्त उत्कृष्ट स्थान—भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लिया।

**मुनियोंने पूछा—**सुरश्रेष्ठ! किस समय पुरुषोत्तम-तीर्थकी यात्रा करनी उचित है और प्रभो! किस

३०- मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना

* मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना * ११९

विधिसे पञ्चतीर्थोंका सेवन करना चाहिये। स्नान-दानरूप एक-एक तीर्थका और देव-दर्शनका जो पृथक्-पृथक् फल हो, वह सब बताइये।

ब्रह्माजी बोले— जो कुरुक्षेत्रमें अपनी इन्द्रियों और क्रोधको जीतकर बिना खाये-पीये सत्तर हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है तथा जो ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह पहलेकी अपेक्षा अधिक फलका भागी होता है। अतः मुनिवरो! स्वर्गलोककी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वे ज्येष्ठ मासमें प्रयत्न करके इन्द्रिय-संयमपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करें। श्रेष्ठ मनुष्यको उचित है कि ज्येष्ठ मासमें शुक्ल पक्षकी द्वादशीको विधिपूर्वक पञ्चतीर्थोंका सेवन करके श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करे। जो ज्येष्ठकी द्वादशीको अविनाशी देवता भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते हैं, वे विष्णुलोकमें पहुँचकर कभी वहाँसे नीचे नहीं गिरते। अतः ज्येष्ठमें प्रयत्नपूर्वक वहाँकी यात्रा करनी चाहिये और वहाँ पञ्चतीर्थ-सेवनपूर्वक पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। जो अत्यन्त दूर होनेपर भी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका कीर्तन करता है, वह शुद्धचित्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। जो श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित्त हो श्रीकृष्णके दर्शनार्थ यात्रा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो दूरसे भगवान् पुरुषोत्तमके प्रासाद-शिखरपर स्थित नीलचक्रका दर्शन करके उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, वह मनुष्य सहसा पापसे मुक्त हो जाता है।


मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना

ब्रह्माजी कहते हैं— मुनिवरो! कल्पके अन्तमें जब महासंहार आरम्भ हुआ, चन्द्रमा, सूर्य और वायुका नाश हो गया, स्थावर-जङ्गम समस्त प्राणी नष्ट होने लगे, उस समयकी बात बतलाता हूँ। पहले प्रलयकालीन प्रचण्ड सूर्यका उदय होता है, फिर मेघोंकी घोर गर्जना होने लगती है। बिजली गिरती है, जिससे वृक्ष और पर्वत टूट-फूट जाते हैं। सारे जगत्‌का संहार हो जाता है। उल्कापात होता रहता है, सरोवरों और नदियोंका सारा जल सूख जाता है। फिर वायुका सहारा पाकर संवर्तक नामक अग्नि समस्त विश्वमें फैल जाती है। ऊपरसे बारह सूर्य तपने लगते हैं। वह आग पृथ्वीको भेदकर रसातलमें भी पहुँच जाती है और देवता, दानव तथा यक्षोंको अत्यन्त भय देने लगती है। पृथ्वीपर जो कुछ रहता है, वह सब जलाकर नागलोकको भी दग्ध करती है और फिर क्रमशः नीचेके समस्त लोकोंको तत्काल नष्ट कर देती है। बीस लाख योजनतक फैली हुई वायु और संवर्तक-अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग और राक्षस—सबको भस्म कर डालती है। ऐसे घोर महाप्रलयके समय परम धर्मात्मा मार्कण्डेय मुनि अकेले ध्यानस्थ होकर बैठे थे। प्रलयाग्निकी लपट उनके पास भी पहुँची। उनके कण्ठ, तालु और ओठ सूख गये। उस महाभयानक अग्निको देखकर वे भयसे विह्वल हो उठे और कोई रक्षक न पा सकनेके कारण इधर-उधर भागने लगे। उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिली। वे सोचने लगे—क्या करूँ, समझमें नहीं आता; किसकी

५१- मार्कण्डेय मुनिका प्रलयाग्निके भयसे भागना

१२०
* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

शरणमें जाऊँ? किस प्रकार सनातन देव पुरुषेशका

दर्शन करूँ? इस प्रकार एकाग्रभावसे चिन्तन करते-करते वे महाप्रलयके कारणभूत सनातन दिव्य पद पुरुषेश नामक वटराजके पास पहुँच गये। उस दिव्य वटको सामने देख मुनि बड़ी उतावलीके साथ उसके निकट गये और उसकी जड़पर जा बैठे। वहाँ न तो कालाग्निका भय था, न अँगारोंकी वर्षाका। न वहाँ संवर्तक अग्नि आ सकती थी और न वज्रपात आदिका ही डर था।

तदनन्तर विद्युन्मालाओंसे विभूषित गजराजोंके समान कान्तिवाले महामेघ आकाशमें घुमड़ आये। उन्होंने समूचे आकाशको ढक लिया और इतनी वृष्टि की कि पर्वत, वन और आकरोंसहित समस्त पृथ्वी जलराशिमें डूब गयी। सम्पूर्ण दिशाएँ पानीसे भर गयीं। मूसलाधार वृष्टि करके वसुंधराको डुबोनेवाले मेघोंने उस भयंकर संवर्तकाग्निको बुझा दिया। इस प्रकार बारह वर्षोंतक भारी वृष्टि होती रही। समुद्रने अपनी मर्यादा छोड़ दी, पर्वत गल-गलकर बह गये और पृथ्वी पानीमें डूब गयी। तत्पश्चात् प्रचण्ड आँधी उठी। उस प्रबल प्रभञ्जनके वेगसे सारे मेघ छिन्न-भिन्न हो गये। उसके बाद भगवान् विष्णु उस भयंकर वायुको पीकर एकार्णवमें शयन करने लगे। उस समय समस्त स्थावर-जङ्गमका अभाव हो गया था। देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष और राक्षस भी नष्ट हो गये थे। उस समय मार्कण्डेय मुनिने विश्रामके अनन्तर श्रीपुरुषोत्तमका ध्यान करनेके पश्चात् जब आँखें खोलीं, तब पृथ्वीको जलमें निमग्न पाया। वह वटवृक्ष, पृथ्वी, दिशा आदि, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, देवता, असुर और नाग आदि कोई भी दिखायी नहीं देते थे। मुनिवर मार्कण्डेय भी स्वयं जलमें गोते खाने लगे। तब उन्होंने तैरना आरम्भ किया। वे आर्तभावसे इधर-उधर तैरते हुए भटकने लगे। उन्हें कोई अपना रक्षक नहीं मिलता था। उनके ध्यान करनेसे भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्नता हुई थी। अतः मुनिको भयसे व्याकुल देख वे कृपापूर्वक बोले—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बेटा मार्कण्डेय! तुम अभी बालक हो। थक गये होगे। आओ, आओ। शीघ्र मेरे पास चले आओ। अब तुम्हें डरनेकी आवश्यकता नहीं है। मेरे सामने आ गये हो।’

भगवान्‌की यह बात सुनकर मुनि चिन्तामें निमग्न हो गये। सोचने लगे, क्या मैंने स्वप्न देखा है अथवा मुझपर यह मोह छा गया है? यह विचार आते ही उनके मनमें दुःखनाशक बुद्धिका उदय हुआ। उन्होंने यह निश्चय किया कि मैं भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी शरणमें जाऊँगा। इस निश्चयके अनुसार मार्कण्डेय मुनि मन-ही-मन भगवान्‌का स्मरण करते हुए उनकी शरणमें गये। तब उन्होंने जलके ऊपर पुनः उस विशाल वटवृक्षको देखा। उसके ऊपर सुन्दर दिव्य पलंग

५२- मार्कण्डेय मुनिको प्रलय-समुद्रमें बालमुकुन्दके दर्शन

  • मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना * १२१

बिछा हुआ था, जिसपर बालरूपधारी भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान हो रहे थे। चार भुजा, सुन्दर अङ्ग, पद्मपत्रके समान विशाल नेत्र, श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षःस्थल और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा थे। हृदय वनमालासे आवृत्त था। वे दिव्य कुण्डल धारण किये हुए थे। गलेमें बहुत-से हार शोभा पाते थे। दिव्य रत्नोंसे उनका शृङ्गार किया गया था। भगवान्‌को इस रूपमें देखकर मार्कण्डेय मुनिके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। वे

भगवान्‌को प्रणाम करके बोले—अहो! इस भयानक एकार्णवमें यह बालक कैसे निर्भय रहता है। इस प्रकार विचार करते हुए वे इधर-उधर बह रहे थे। उनकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। वे अपने उद्धारके लिये व्याकुल हो गये। उस समय उन्हें बड़ा खेद हुआ। इधर वटवृक्षपर सोया हुआ बालक बालसूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। वह अपनी महिमामें ही स्थित था। मार्कण्डेय

मुनि उस सम्पूर्ण तेजोमय बालककी ओर देखनेमें भी असमर्थ हो गये। मुनिको अपनी ओर आते देख बालकने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—‘बेटा! जानता हूँ, तुम बहुत थक गये हो और अपनी रक्षाके लिये मेरे पास आये हो। अब शीघ्र ही मेरे शरीरमें प्रवेश कर जाओ। यहाँ तुम्हें पूर्ण विश्राम मिलेगा।' बालककी बात सुनकर मार्कण्डेय मुनि कुछ बोल न सके। वे भगवान्‌की मायासे मोहित हो विवश होकर बालकके खुले हुए मुँहमें प्रवेश कर गये। उसके उदरमें प्रवेश करनेपर उन्होंने वहाँ अनेक जनपदोंसे घिरी हुई समूची पृथिवी देखी। खारे पानी, ईखके रस, घी, दही और मीठे जलके समुद्रोंको देखा। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर नामक द्वीपोंका अवलोकन किया। भारत आदि सम्पूर्ण वर्ष और पर्वतोंका निरीक्षण किया। सब रत्नोंसे सम्पन्न सुवर्णमय मेरुगिरिको भी देखा, जो अनेक प्रकारके रत्नमय शिखरोंसे विभूषित, अनेक कन्दराओंसे युक्त, नाना मुनिजनोंसे व्याप्त, भाँति-भाँतिके वृक्षों और वनोंसे परिपूर्ण, अनेक जीव-जन्तुओंसे सेवित, अनेकानेक आश्चर्योंसे युक्त, बाघ, सिंह, सूअर, चँवरी गाय, भैंसे, हाथी, हरिन, वानर तथा अन्य जीव-जन्तुओंसे सुशोभित एवं अत्यन्त मनोहर था। इन्द्र आदि अनेक देवता, सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, यक्ष, अप्सरा तथा अन्य स्वर्गवासियोंसे उस पर्वतकी पूर्ण शोभा हो रही थी। इस प्रकार शोभामय सुमेरु पर्वतको देखते हुए वे बालकके उदरमें भ्रमण करने लगे। उन्होंने क्रमशः हिमवान्, हेमकूट, निषध, गन्धमादन, श्वेत, दुर्धर, नील, कैलास, मन्दरगिरि, महेन्द्र, मलय, विन्ध्य, पारियात्र, अर्बुद, सह्य, शुक्तिमान् तथा मैनाक आदि बहुत-से पर्वतोंको देखा। उन्होंने इस लोकमें जितने भी

१२२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

चराचर भूत देखे थे, वे सब उन्हें भगवान्‌की कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। अथवा बहुत कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत्—भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक, सत्यलोक, अतल, वितल, सुतल, पाताल, रसातल और महातलरूप ब्रह्माण्डको उन्होंने बालरूपधारी भगवान्‌के उदरमें देखा। उस समय मार्कण्डेयजीकी सर्वत्र बेरोकटोक गति थी। भगवान्‌की कृपासे उनकी स्मरण-शक्तिका लोप नहीं होता था। वे भगवान्‌के उदरमें सम्पूर्ण जगत्‌का अवलोकन करते हुए घूमते फिरे, किंतु उनके शरीरका कहीं अन्त नहीं मिला। तब वे वरदायक देवता श्रीहरिकी शरणमें गये। इसी समय सहसा वे वायुके वेगसे खिंचकर भगवान्‌के खुले हुए मुखसे बाहर निकल आये।

बाहर निकलनेपर उन्हें पुनः मनुष्योंसे शून्य सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें निमग्न दिखायी दी। साथ ही वटवृक्षकी शाखापर पलंगके ऊपर विराजमान शिशुरूपधारी भगवान्‌का भी दर्शन हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें लेकर विराजमान थे। उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित, नेत्र पद्मपत्रके समान विशाल और श्रीअङ्ग पीताम्बरसे आच्छादित था। उनकी चार भुजाएँ शोभा पा रही थीं। भगवान्‌ने देखा मार्कण्डेय मुनि मुखसे निकलकर जलमें तैरते हुए अचेत-से हो रहे हैं। तब उन्होंने हँसकर कहा—'बेटा! क्या तुमने मेरे उदरमें रहकर विश्राम कर लिया? वहाँ घूमते समय तुमने क्या-क्या आश्चर्य देखा? मुनिश्रेष्ठ! एक तो तुम मेरे भक्त, दूसरे थके-माँदे और तीसरे मेरे शरणागत हो। अतः तुम्हारा उपकार करनेके लिये मैं तुमसे बातचीत करता हूँ। इधर मेरी ओर देखो तो सही।'

भगवान्‌का यह वचन सुनकर मार्कण्डेय मुनिका रोम-रोम हर्षसे खिल उठा। यद्यपि दिव्य रत्नोंसे अलंकृत तेजोमय भगवान्‌की ओर देखना अत्यन्त कठिन था तो भी उन्होंने उनको देखा। भगवान्‌की कृपासे उन्हें क्षणभरमें नूतन, प्रसन्न एवं निर्मल दृष्टि प्राप्त हो गयी। तब मार्कण्डेयजीने भगवान्‌के देववन्दित चरणोंको, जिनकी अँगुलियाँ और तलवे लाल-लाल थे, मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। हर्षसे युक्त और विस्मित होकर बारंबार उनकी ओर देखा तथा हाथ जोड़कर हर्षगद्गद वाणीमें उन परमात्माका स्तवन आरम्भ किया।

मार्कण्डेयजी बोले—मायासे बाल-रूप धारण करनेवाले देवदेव जगन्नाथ! कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाले सुरश्रेष्ठ पुरुषोत्तम! मैं दुःखित होकर आपकी शरणमें आया हूँ। मेरी रक्षा कीजिये। संवर्तक नामक अग्निने मुझे संतप्त कर रखा है। मैं अँगारोंकी वर्षासे भयभीत हो रहा हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। देवेश! पुरुषोत्तम! मैंने आपके उदरमें चराचर जगत्‌का अवलोकन किया है। इससे मुझे बड़ा विस्मय हुआ है। मैं विषादग्रस्त तो हूँ ही। मेरी रक्षा कीजिये। पुरुषोत्तम! इस अवलम्बशून्य संसारमें आपके सिवा दूसरा कोई सहारा देनेवाला नहीं है। मुझपर प्रसन्न होइये। सुरश्रेष्ठ! प्रसन्न होइये। विबुधप्रिय! प्रसन्न होइये। देवताओंके नाथ! प्रसन्न होइये। देवताओंके निवासस्थान! प्रसन्न होइये। जगत्‌के कारणोंके भी कारण सर्वलोकेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। सबकी सृष्टि करनेवाले देव! प्रसन्न होइये। धरणीधर! मुझपर प्रसन्न होइये। जलमें निवास करनेवाले परमेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। मधुसूदन! मुझपर प्रसन्न होइये। कमलाकान्त! प्रसन्न होइये। त्रिदशेश्वर! प्रसन्न होइये। कंस और केशीका नाश करनेवाले

  • मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना * १२३

श्रीकृष्ण! प्रसन्न होइये। अरिष्टासुरका नाश करनेवाले गोविन्द! प्रसन्न होइये। दैत्यनाशक श्रीकृष्ण! प्रसन्न होइये। दानवोंका अन्त करनेवाले वासुदेव! प्रसन्न होइये। मथुरावासी हरे! प्रसन्न होइये। यदुनन्दन! प्रसन्न होइये। इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्र! प्रसन्न होइये। वरदायक अविनाशी देव! प्रसन्न होइये। भगवन्! आप ही पृथ्वी, आप ही जल, आप ही अग्नि और आप ही वायु हैं। जगत्पते! आकाश, मन, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति तथा सत्त्वादि गुण भी आप ही हैं। आप सम्पूर्ण विश्वमें व्यापक पुरुष हैं। पुरुषसे भी उत्तम पुरुषोत्तम हैं। प्रभो! आप ही सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके शब्द आदि विषय हैं। आप ही दिक्पाल, धर्म, वेद, दक्षिणासहित यज्ञ, इन्द्र, शिव, देवता, हविष्य और अग्नि हैं। वसु, रुद्र, आदित्य और ग्रह भी आपके ही स्वरूप हैं और जितनी भी जातियाँ हैं, जो कुछ भी जीव-नामधारी पदार्थ है, वह सब आप ही हैं। अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक जो कुछ भी भूत, भविष्य और वर्तमान चराचर जगत् है, वह आप ही हैं। देव! आपका जो परमस्वरूप है, वह कूटस्थ, अचल एवं ध्रुव है। उसे ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान पाते। फिर हम-जैसे छोटी बुद्धिवाले मनुष्य कैसे उसका तत्त्व समझ सकते हैं। भगवन्! आप शुद्धस्वभाव, नित्य, प्रकृतिसे परे, अव्यक्त, शाश्वत, अनन्त एवं सर्वव्यापी महेश्वर हैं। आप ही आकाशस्वरूप, परम शान्त, अजन्मा, व्यापक एवं अविनाशी हैं। इस प्रकार आपके निर्गुण एवं निरञ्जन (मायारहित शुद्ध) रूपकी स्तुति कौन कर सकता है। देव! अविनाशी देवदेवेश्वर! मैंने जो विकल एवं अल्पज्ञान होनेके कारण आपके स्तवनकी धृष्टता की है, उसे आप क्षमा करनेकी कृपा करें।

मार्कण्डेयके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—'मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहो। ब्रह्मर्षे! तुम मुझसे जो कुछ चाहोगे, वह सब तुम्हें दूँगा।'

मार्कण्डेयजी बोले—देव! मैं आपको और आपकी मायाको जानना चाहता हूँ। देवेश! आपकी कृपासे मेरी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई है। पुण्डरीकाक्ष! आप अव्यय हैं, मैं आपके तत्त्वको समझना चाहता हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्को पीकर आप साक्षात् परमेश्वर यहाँ बालरूपसे क्यों रहते हैं? ये सब बातें बतानेकी कृपा करें।

मुनिके इस प्रकार पूछनेपर परम कान्तिमान् देवाधिदेव श्रीहरिने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—"ब्रह्मन्! देवता भी मुझे ठीक-ठीक नहीं जानते; किंतु तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं अपना रहस्य बतलाऊँगा कि कैसे इस जगत्की सृष्टि करता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम पितृभक्त हो और मेरी शरणमें आये हो; इसीलिये तुम्हें मेरे स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। तुम्हारा ब्रह्मचर्य महान् है। पूर्वकालमें मैंने जलको 'नारा' नाम दिया था, उस 'नारा' में मेरा सदा अयन (निवास) रहता है; इसलिये मैं 'नारायण' कहलाता हूँ। द्विजोत्तम! मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन, अविनाशी, सम्पूर्ण भूतोंका स्रष्टा और संहर्ता हूँ। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही देवराज इन्द्र हूँ। यक्षराज कुबेर और प्रेतराज यम भी मैं ही हूँ। मैं ही शिव, चन्द्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ। अग्नि मेरा मुख, पृथ्वी चरण, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र, द्युलोक मस्तक, आकाश और दिशाएँ कान तथा जल स्वेद है। दिशाओंसहित

१२४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


आकाश मेरा शरीर और वायु मेरे मनमें स्थित है। मैंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। पृथ्वीपर वेदके विद्वान् देवयज्ञमें स्थित मुझ विष्णुका ही यजन करते हैं। स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले मुख्य-मुख्य क्षत्रिय और वैश्य भी यज्ञके द्वारा मेरी आराधना करते हैं। मैं ही शेषनाग होकर चारों ओरके समुद्रों और मेरुपर्वतसहित समस्त पृथ्वीको अकेला ही धारण करता हूँ। पूर्वकालमें वाराहरूप धारण करके मैंने ही जलमें डूबी हुई इस पृथ्वीका अपनी शक्तिसे उद्धार किया था। द्विजश्रेष्ठ! मैं ही बड़वानल होकर समुद्रका जल पीता और मेघरूपसे उसकी वर्षा करता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख, क्षत्रिय मेरी भुजाएँ, वैश्य जाँघ और शूद्र चरण हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मुझसे ही प्रकट होते और फिर मुझमें ही प्रवेश कर जाते हैं। ज्ञानपरायण संन्यासी, संयमशील जिज्ञासु तथा काम, क्रोध एवं द्वेषसे रहित, अनासक्त, निष्पाप, सत्त्वस्थ, अहंकारशून्य तथा अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं। मैं ही संवर्तक ज्योति, मैं ही संवर्तक अग्नि, मैं ही संवर्तक सूर्य और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। आकाशमें जो ये तारे दिखायी देते हैं, इन सबको मेरे ही रोम-कूप समझो। रत्नोंसे भरे हुए समुद्र और चारों दिशाओंको मेरे ही स्वरूप जानो। मनुष्य जिस कर्मका अनुष्ठान करके कल्याणके भागी होते हैं, वह भी मेरा ही स्वरूप है। सत्य, दान, उग्र तपस्या और अहिंसा—ये मेरे बनाये हुए विधानके अनुसार ही विहित माने जाते हैं और मेरे ही स्वरूपमें इनकी स्थिति है। जिनकी ज्ञानशक्ति मेरे द्वारा अभिभूत हो जाती है, वे इच्छानुसार चेष्टा नहीं कर पाते। वेदोंका सम्यक् स्वाध्याय करके भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा यजन करनेवाले शान्तचित्त एवं क्रोधपर विजय पानेवाले ब्राह्मण मुझे प्राप्त करते हैं। पापाचारी, लोभी, कृपण, अनार्य तथा मनको वशमें न रखनेवाले मनुष्योंको मैं कभी नहीं मिल सकता। जिनके अन्तःकरण शुद्ध हैं, उन्हें प्राप्त होनेवाला महान् फल मुझे ही समझो। कुयोगसेवी मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं अत्यन्त दुर्लभ हूँ। संतशिरोमणे! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है तब-तब मैं अपनेको प्रकट करता हूँ।* हिंसापरायण दैत्य तथा भयंकर राक्षस, जो बड़े-बड़े देवताओंके लिये भी अवध्य हैं, जब इस संसारमें जन्म लेते हैं, तब मैं पुण्यात्मा पुरुषोंके घरोंमें अवतार लेता हूँ। मनुष्य-देहमें प्रवेश करके समस्त बाधाओंका शमन करता हूँ। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसों और स्थावर भूतोंकी अपनी मायासे सृष्टि करके मैं पुनः उनका संहार करता हूँ। फिर कर्मकालमें उनके योग्य शरीरका विचार करके सृष्टि करता हूँ। मेरा स्वरूपभूत धर्म सत्ययुगमें श्वेत रहता है, त्रेतामें श्याम होता है, द्वापर आनेपर लाल हो जाता है और कलियुगमें काला पड़ जाता है। प्रलयकाल आनेपर मैं ही अत्यन्त दारुण कालरूप हो अकेला ही समस्त त्रिलोकीका नाश करता हूँ। उत्पत्ति, पालन और संहार—ये तीन मेरे ही धर्म हैं। मैं सम्पूर्ण विश्वका आत्मा और सब लोकोंको सुख पहुँचानेवाला हूँ। मेरा किसीसे पार्थक्य नहीं है। मैं सर्वव्यापी, अनन्त और इन्द्रियोंका नियन्ता हूँ। मेरे डग बहुत बड़े हैं।


* यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम ॥ अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।
(५६। ३५-३६)

  • मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना * १२५

मैं अकेला ही काल-चक्रका संचालन करता हूँ। जो ब्रह्मका रूप है, वह मेरा ही है। वही सम्पूर्ण भूतोंको शान्ति देनेवाला है। उसका उद्यम सम्पूर्ण भूतोंके हितके लिये ही होता है। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा आत्मा सम्पूर्ण भूतोंमें संनिहित है। फिर भी मुझे कोई नहीं जानता। भक्तगण सब लोकोंमें सर्वथा मेरा पूजन करते हैं। ब्रह्मन्! मुझमें तुमने जो कुछ भी क्लेशका अनुभव किया है, वह सब तुम्हारे सुखके उदय और कल्याणकी प्राप्तिका कारण है। तुमने लोकमें स्थावर-जङ्गमरूप जो कुछ भी देखा है, वह सब सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाला मेरा आत्मा ही है, जिसे मैंने उस रूपमें प्रकट किया है। मैं ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाला नारायण हूँ। जबतक एक हजार महायुगोंका समय नहीं बीत जाता, तबतक सम्पूर्ण विश्वको मोहित करके यहाँ जलमें शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! जबतक ब्रह्मा सोकर उठ नहीं जाते, तबतक मैं हर समय यहाँ शिशुरूपमें निवास करता हूँ। विप्रेन्द्र! मुझ ब्रह्मरूपी परमात्माने अनेक बार संतुष्ट होकर तुम्हें वरदान दिया है। समस्त चराचर जगत्‌का नाश होकर सब कुछ एकार्णवमें मग्न हो जानेपर तुम मेरी ही आज्ञासे यहाँ आ निकले हो। फिर जब मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए हो तब मैंने तुम्हें सम्पूर्ण जगत्‌का अवलोकन कराया है। वहाँ सम्पूर्ण लोकोंको देखकर तुम विस्मयमें पड़ गये और मुझे समझ नहीं पाये। तब तुरंत ही मैंने तुम्हें अपने मुखसे बाहर निकाल दिया और जो देवता और असुरोंके लिये दुर्ज्ञेय है, उस अपने आत्मतत्त्वका तुमसे वर्णन किया है। ब्रह्मर्षे! जबतक महातपस्वी ब्रह्माजी जागते नहीं तबतक तुम यहीं निर्भय होकर सुखपूर्वक विचरो। उनके जागनेके बाद मैं अकेला ही समस्त भूतों और उनके शरीरोंकी सृष्टि करूँगा।'

इतना कहकर भगवान्‌ने मुनिवर मार्कण्डेयजीसे पूछा—'मुने! तुमने जिस अभिप्रायसे मेरी स्तुति की है, उसे कहो। मैं तुम्हें शीघ्र ही उत्तम वरदान दूँगा।' भगवान्‌का यह कल्याणमय वचन सुनकर मार्कण्डेय मुनि सहसा उनके चरणोंमें गिर पड़े और इस प्रकार बोले—'देवेश! मैंने आपके उत्कृष्ट स्वरूपका दर्शन किया, इससे मेरा सारा मोह दूर हो गया। नाथ! अब मैं आपकी कृपासे यह चाहता हूँ कि सम्पूर्ण लोकोंके हित, भिन्न-भिन्न भावनाओंकी पूर्ति तथा शैव और वैष्णवोंके विवाद-निवारणके लिये मैं इस परम उत्तम पवित्र पुरुषोत्तमतीर्थमें भगवान् शिवका बहुत बड़ा मन्दिर बनवाऊँ और उसमें शंकरजीकी प्रतिष्ठा करूँ। इससे संसारके लोग यह जान लेंगे कि विष्णु और शिव एकरूप ही हैं।' यह सुनकर भगवान् जगन्नाथने पुनः महामुनि मार्कण्डेयजीसे कहा—'ब्रह्मन्! तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही एक मन्दिर बनवाओ और उसमें नाना भावोंकी पूर्ति एवं आराधनाके लिये परम कारणभूत भुवनेश्वर-लिङ्गकी स्थापना करो। उनके प्रभावसे तुम्हारा भगवान् शिवके लोकमें अक्षय निवास होगा। शिवकी स्थापना करनेपर मेरी ही स्थापना होती है। हम दोनोंमें तनिक भी अन्तर नहीं है। हम एक ही तत्त्व दो रूपमें व्यक्त हुए हैं। जो रुद्र हैं, वही विष्णु हैं; जो विष्णु हैं वही महादेव हैं। वायु और आकाशकी भाँति हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। जो अज्ञानसे मोहित है, वह इस बातको नहीं जानता कि जो गरुडध्वज हैं, वही वृषभध्वज हैं। अतः ब्रह्मन्! तुम अपने नामसे शिवालय बनवाओ और देवाधिदेव भगवान्‌से उत्तरकी

३१- मार्कण्डेश्वर शिव, वटवृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र एवं सुभद्राके दर्शन-पूजनका माहात्म्य

१२६* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

ओर एक सुन्दर तीर्थ (सरोवर)-का निर्माण करो। वह तीर्थ मनुष्य-लोकमें मार्कण्डेयह्रदके नामसे विख्यात होगा। उसमें स्नान करनेसे सब पापोंका नाश हो जायगा।'

मार्कण्डेय मुनिसे यों कहकर सर्वव्यापी जनार्दन वहीं अन्तर्धान हो गये।

मार्कण्डेयेश्वर शिव, वटवृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र एवं सुभद्राके दर्शन-पूजनका माहात्म्य

**ब्रह्माजी कहते हैं—**ब्राह्मणो! अब मैं पञ्चतीर्थकी विधि बतलाऊँगा तथा स्नान, दान और देव-दर्शनसे जो फल होता है, उसका वर्णन करूँगा। मार्कण्डेयह्रदमें जाकर मनुष्य उत्तराभिमुख हो तीन बार डुबकी लगाये और निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—

संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम्।
त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते॥
नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च।
स्नानं करोमि देवेश मम नश्यतु पातकम्॥

'भगके नेत्रोंका नाश करनेवाले त्रिपुरशत्रु भगवान् शिव! मैं संसार-सागरमें निमग्न, पापग्रस्त एवं अचेतन हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। समस्त पापोंको दूर करनेवाले शान्तस्वरूप शिवको नमस्कार है। देवेश्वर! मैं यहाँ स्नान करता हूँ। मेरा सारा पातक नष्ट हो जाय।'

यों कहकर बुद्धिमान् पुरुष नाभिके बराबर जलमें स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और ऋषियोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। फिर तिल और जल लेकर पितरोंकी भी तृप्ति करे। उसके बाद आचमन करके शिव-मन्दिरमें जाय। उसके भीतर प्रवेश करके तीन बार देवताकी परिक्रमा करे। तदनन्तर 'मार्कण्डेयेश्वराय नमः' इस मूलमन्त्रसे अथवा अघोर^१मन्त्रसे शंकरजीकी पूजा करके उन्हें प्रणाम करे और निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर उन्हें प्रसन्न करे—

त्रिलोचन नमस्तेऽस्तु नमस्ते शशिभूषण।
त्राहि मां त्वं विरूपाक्ष महादेव नमोऽस्तु ते॥

'तीन नेत्रोंवाले शंकर! आपको नमस्कार है, चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। विकट नेत्रोंवाले शिवजी! आप मेरी रक्षा कीजिये। महादेव! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार मार्कण्डेयह्रदमें स्नान करके भगवान् शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो शिवके लोकमें जाता है।

वहाँसे कल्पान्तस्थायी वटवृक्षके पास जाकर उसकी तीन परिक्रमा करे। फिर निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा बड़ी भक्तिके साथ उस वटकी पूजा करे—

ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महाप्रलयकारिणे।
महद्रसोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते॥
अमरस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट।
न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते॥

'अव्यक्तस्वरूप महाप्रलयकारी एवं महान् रससे युक्त आप वटवृक्षको नमस्कार है। हे वट! आप प्रत्येक कल्पमें अमर हैं। आपपर भगवान् श्रीहरिका निवास है। न्यग्रोध! मेरे पाप हर लीजिये। कल्पवृक्ष! आपको नमस्कार है।'

इसके बाद भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके उस कल्पान्तस्थायी वटको नमस्कार करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य केंचुलसे छूटे हुए सर्पकी भाँति सहसा पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस वृक्षकी छायामें


१-ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः।

* मार्कण्डेयेश्वर शिव, वटवृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र एवं सुभद्राके दर्शन-पूजनका माहात्म्य * १२७

पहुँच जानेपर मनुष्य ब्रह्महत्यासे भी मुक्त हो जाता है, फिर अन्य पापोंकी तो बात ही क्या है। भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुए ब्रह्मतेजोमय वटवृक्षरूपी विष्णुको प्रणाम करके मानव राजसूय और अश्वमेध-यज्ञसे भी अधिक फल पाता है और अपने कुलका उद्धार करके विष्णुलोकमें जाता है। भगवान् श्रीकृष्णके सामने खड़े हुए गरुड़को जो नमस्कार करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके वैकुण्ठधाममें जाता है। वटवृक्ष और गरुड़का दर्शन करनेके पश्चात् जो पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जगन्नाथ श्रीकृष्णके मन्दिरमें प्रवेश करके तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर नाममन्त्रसे बलभद्रजीका भक्तिपूर्वक पूजन करके निम्नाङ्कित रूपसे प्रार्थना करे—

नमस्ते हलधृग्राम नमस्ते मुसलायुध।
नमस्ते रेवतीकान्त नमस्ते भक्तवत्सल॥
नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते धरणीधर।
प्रलम्बारे नमस्तेऽस्तु त्राहि मां कृष्णपूर्वज॥

‘हलधारण करनेवाले राम! आपको नमस्कार है। मूसलको आयुध रूपमें रखनेवाले! आपको नमस्कार है। रेवतीरमण! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। बलवानोंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। पृथ्वीको मस्तकपर धारण करनेवाले शेषजी! आपको नमस्कार है। प्रलम्बशत्रो! आपको नमस्कार है। श्रीकृष्णके अग्रज! मेरी रक्षा कीजिये।’

इस प्रकार कैलासशिखरके समान आकार और चन्द्रमासे भी कमनीय मुखवाले, नीलवस्त्रधारी, देवपूजित, अनन्त, अजेय, एक कुण्डलसे विभूषित, फणोंके द्वारा विकट मस्तकवाले, महाबली हलधरको प्रसन्न करे। बलरामजीकी पूजाके पश्चात् विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त हो द्वादशाक्षर-मन्त्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’-से भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। जो द्वादशाक्षर-मन्त्रके द्वारा भक्तिपूर्वक सदा भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं। देवता, योगी तथा सोमपान करनेवाले याज्ञिक भी जिस गतिको नहीं पाते, उसीको द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप करनेवाले पुरुष प्राप्त कर लेते हैं। अतः उसी मन्त्रसे भक्तिपूर्वक गन्ध-पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा जगद्गुरु श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्हें प्रणाम करे। फिर इस प्रकार प्रार्थना करे—‘जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। सब पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। चाणूर और केशीके नाशक! आपकी जय हो। कंसनाशन! आपकी जय हो। कमललोचन! आपकी जय हो। चक्रगदाधर! आपकी जय हो। नील मेघके समान श्यामवर्ण! आपकी जय हो। सबको सुख देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। जगत्पूज्य देव! आपकी जय हो। संसारसंहारक! आपकी जय हो। लोकपते नाथ! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देवता! आपकी जय हो। यह भयङ्कर संसारसागर सर्वथा निःसार है। इसमें दुःखमय फेन भरा हुआ है। यह क्रोधरूपी ग्राहसे पूर्ण है। इसमें विषयरूपी जलराशि भरी हुई है। भाँति-भाँतिके रोग ही इसमें उठती हुई लहरें हैं। मोहरूपी भँवरोंके कारण यह अत्यन्त दुस्तर जान पड़ता है। सुरश्रेष्ठ! मैं इस घोर संसाररूपी समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिये।’ इस प्रकार प्रार्थना करके जो देवेश्वर, वरदायक, भक्तवत्सल, सर्वपापहारी, समस्त अभिलषित फलोंके दाता, मोटे कंधे और दो भुजाओंवाले, श्यामवर्ण, कमलपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाले, चौड़ी छाती, विशाल भुजा, पीत वस्त्र और सुन्दर मुखवाले, शङ्ख-चक्र-गदाधर, मुकुटाङ्गदभूषित, समस्त शुभ लक्षणोंसे

३२- पुरुषोत्तमक्षेत्रमें भगवान् नृसिंह तथा श्वेतमाधवका माहात्म्य

१२८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

युक्त और वनमालाविभूषित भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और उन्हें प्रणाम करता है, वह हजारों अश्वमेध-यज्ञोंका और सब तीर्थोंमें स्नान और दान करनेका फल पाता है। सम्पूर्ण वेद, समस्त यज्ञ, सारे दान, व्रत, नियम, उग्र तपस्या और ब्रह्मचर्यके सम्यक् पालनसे जो फल मिलता है, वही भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन और वन्दनसे प्राप्त होता है। शास्त्रोक्त आचारका पालन करनेवाले गृहस्थको, वनवासके नियमोंका पालन करनेसे वानप्रस्थको और शास्त्रोक्त रीतिसे संन्यास-धर्मका पालन करनेपर संन्यासीको जो फल प्राप्त होता है, वही श्रीकृष्णका दर्शन और उन्हें प्रणाम करनेवाला मनुष्य प्राप्त कर लेता है। भगवद्दर्शनके माहात्म्यके सम्बन्धमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, भगवान् श्रीकृष्णका भक्तिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य दुर्लभ मोक्षतक प्राप्त कर लेता है।

तत्पश्चात् भक्तोंपर स्नेह रखनेवाली सुभद्रादेवीका भी नाममन्त्रसे पूजन करके उन्हें प्रणाम करे और हाथ जोड़कर निम्नाङ्कित रूपसे प्रार्थना करे—

नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे।
त्राहि मां पद्मपत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

'देवि! तुम सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली और शुभ सौख्य प्रदान करनेवाली हो। तुम्हें बारंबार नमस्कार है। पद्मपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनि! मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है।'

इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली, लोकहितकारिणी, वरदायिनी एवं कल्याणमयी बलभद्रभगिनी सुभद्रादेवीको प्रसन्न करके मनुष्य इच्छानुसार गतिसे चलनेवाले विमानके द्वारा श्रीविष्णुके वैकुण्ठधाममें जाता है।


पुरुषोत्तमक्षेत्रमें भगवान् नृसिंह तथा श्वेतमाधवका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— इस प्रकार बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राको प्रणाम करके भगवान्‌के मन्दिरसे बाहर निकले। तत्पश्चात् जगन्नाथजीके मन्दिरको प्रणाम करके एकाग्रचित्त हो उस स्थानपर जाय, जहाँ भगवान् विष्णुकी इन्द्रनीलमयी प्रतिमा बालूके भीतर छिपी है। वहाँ अदृश्यरूपसे स्थित भगवान्‌को प्रणाम करके मनुष्य श्रीविष्णुके धाममें जाता है। ब्राह्मणो! जो भगवान् सर्वदेवमय हैं, जिन्होंने आधा शरीर सिंहका बनाकर असुरराज हिरण्यकशिपुका वध किया था, वे भगवान् नृसिंह भी पुरुषोत्तमतीर्थमें निवास करते हैं। जो भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करके प्रणाम करता है, वह समस्त पातकोंसे निश्चय ही मुक्त हो जाता है। जो मानव इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहके भक्त होते हैं, उन्हें पाप कभी छू नहीं सकते और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे प्रयत्न करके भगवान् नृसिंहकी शरण ले; क्योंकि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल प्रदान करते हैं।

मुनियोंने कहा— इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहका माहात्म्य सुखदायक और दुर्लभ है। हम उनका प्रभाव विस्तारके साथ सुनना चाहते हैं। इसके लिये हमें बड़ी उत्कण्ठा है।

ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! मैं अजित, अप्रमेय तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नृसिंहका प्रभाव बतलाता हूँ; सुनो। उनके समस्त गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है, अतः मैं भी संक्षेपसे ही बतलाऊँगा। इस लोकमें जो कोई दैवी अथवा मानुषी सिद्धियाँ सुनी जाती हैं, वे सब भगवान्‌के प्रसादसे ही सिद्ध होती हैं। स्वर्ग,

* पुरुषोत्तमक्षेत्रमें भगवान् नृसिंह तथा श्वेतमाधवका माहात्म्य * १२९


मर्त्यलोक, पाताल, दिशा, जल, गाँव तथा पर्वत—इन सब स्थानोंमें भगवान्‌के प्रसादसे मनुष्यकी अबाध गति होती है। इस चराचर जगत्‌में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो भक्तवत्सल भगवान् नृसिंहके लिये असाध्य हो। मुनिवरो! सनातन कल्पराज (पूजाकी सर्वश्रेष्ठ विधि) एवं नरसिंहका तत्त्व, जिसे देवता या असुर भी नहीं जानते, तुम्हें बताता हूँ; सुनो। उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजनकी आवश्यकता पूर्ण करे अथवा दूध पीकर रहे। इन्द्रियोंको काबूमें रखकर धर्मपरायण रहे। वन, एकान्त प्रदेश, पर्वत, नदी-संगम, ऊसर, सिद्धक्षेत्र अथवा नृसिंहके मन्दिरमें जाकर या स्वयं स्थापना करके भगवान्‌की विधिपूर्वक पूजा करे। शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास करके जितेन्द्रियभावसे बीस लाख भगवन्नामका जप करे। ऐसा करनेवाला साधक उपपातक और महापातकोंसे युक्त होनेपर भी मुक्त हो जाता है। पहले भगवान् नृसिंहकी प्रदक्षिणा करके चन्दन और धूप आदिके द्वारा उनकी पूजा करे। मस्तक झुकाकर प्रभुको प्रणाम करे तथा उनके माथेपर कपूर और चन्दन मिले हुए चमेलीके फूल चढ़ावे। इससे सिद्धि प्राप्त होती है। किसी भी कार्यमें भगवान्‌की गति कुण्ठित नहीं होती। ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता भी उनके तेजको नहीं सह सकते। फिर संसारमें सिद्ध, गन्धर्व, मानव, दानव, विद्याधर, यक्ष, किंनर और महानागोंकी तो बात ही क्या है। अन्य साधक जिन असुरोंका नाश करनेके लिये मन्त्र-जप करते हैं, वे सब नृसिंहभक्तोंको सूर्यके समान तेजस्वी देखकर तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। महाबली भगवान् नरसिंह सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं। अतः मुनीश्वरो! समस्त अभिलषित फलोंके दाता महापराक्रमी भगवान् नरसिंहकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र और अन्त्यज भी सुरश्रेष्ठ नृसिंहका भक्तिपूर्वक पूजन करके कोटिजन्मोंके पाप और दुःखोंसे मुक्त हो जाते हैं। मनोवाञ्छित फल पाते हैं। देव, गन्धर्व एवं इन्द्रका पद भी प्राप्त कर लेते हैं। एक बार भी भगवान् नरसिंहका भक्तिपूर्वक दर्शन करनेसे करोड़ों जन्मोंके पापों और दुःखोंसे छुटकारा मिल जाता है। संग्राम, संकट, दुर्गमस्थान, चोर-व्याघ्र आदिकी पीड़ा, प्राणसंशय, विष, अग्नि, जल, राजभय, समुद्रभय तथा ग्रह-रोग आदिजनित कष्ट प्राप्त होनेपर जो पुरुष भगवान् नरसिंहका स्मरण करता है, वह सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है। जैसे सूर्योदय होनेपर महान् अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् नरसिंहका दर्शन होनेपर सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।

अनन्त नामक वासुदेवका भक्तिपूर्वक दर्शन और उन्हें वन्दन करनेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। मैंने, इन्द्रने तथा विभीषणने भी उनकी आराधना की है। फिर कौन मनुष्य उनकी आराधना न करेगा। जो मनुष्य श्वेतगङ्गामें स्नान करके श्वेतमाधव तथा मत्स्यमाधवका दर्शन करता है, वह श्वेतद्वीपमें जाता है।

**मुनियोंने कहा—**भगवन्! आप श्वेतमाधवके माहात्म्यका पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये। साथ ही भगवान्‌की प्रतिमाका वृत्तान्त भी विस्तारके साथ बतलाइये। भूतलमें विख्यात भगवान्‌के पवित्र क्षेत्रमें श्वेतमाधवकी स्थापना किसने की थी?

**ब्रह्माजी बोले—**सत्ययुगमें श्वेत नामके एक बलवान् राजा थे। वे बड़े बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, शूरवीर, सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले थे। उनके राज्यमें दस हजार वर्षोंतक मनुष्योंकी आयु होती थी और किसी बालककी मृत्यु नहीं

५३- भगवान् शिवका श्वेतको दर्शन देना और मरे हुए ब्राह्मण-बालकको जिलाना

१३० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


होती थी। इस प्रकार राजा श्वेतके राज्यमें कुछ काल व्यतीत होनेके पश्चात् एक घटना घटित हुई। कपालगौतम नामक एक परम धर्मात्मा ऋषि थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो कालवश दाँत निकलनेके पहले ही चल बसा। उसे गोदमें लेकर बुद्धिमान् ऋषि राजाके निकट आये। राजाने ऋषिकुमारको अचेत अवस्थामें सोया देख उसको जीवित करनेके लिये प्रतिज्ञा की।

राजा बोले— यदि यमलोकमें गये हुए इस बालकको मैं सात दिनके भीतर न ला सकूँ तो जलती हुई चितापर चढ़ जाऊँगा।

यों कहकर राजाने लाख नीलकमलोंसे महादेवजीकी पूजा करके उनके मन्त्रका जप आरम्भ किया। जगदीश्वर भगवान् शिव राजाकी अत्यन्त भक्तिका विचार करके पार्वतीजीके साथ उनके सामने प्रकट हुए और बोले—‘राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।' महादेवजीका यह वचन सुनकर राजा श्वेतने सहसा उनकी ओर देखा। वे सब अङ्गोंमें भस्म रमाये हुए थे। उनके शरीरकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमा और कुन्दके समान थी। उनके नेत्र विकट थे। व्याघ्रचर्मका वस्त्र और ललाटमें चन्द्रमाकी रेखा थी। उनपर दृष्टि पड़ते ही राजाने सहसा पृथ्वीपर गिरकर उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि आपकी मुझपर दया है तो कालके वशमें पड़ा हुआ यह ब्राह्मण-बालक पुनः जीवित हो जाय। यही मेरी प्रतिज्ञा है। महेश्वर! आप इसे यथायोग्य आयुसे युक्त और कल्याणका भागी बनायें।'

श्वेतकी यह बात सुनकर महादेवजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सब भूतोंको भय देनेवाले कालको आज्ञा दी और कालने मृत्युके मुखमें पड़े हुए उस बालकको जीवित कर दिया। इसके बाद वे पार्वतीदेवीके साथ अन्तर्धान हो गये।

तदनन्तर राजाने हजारों वर्षोंतक एकाग्रचित्त होकर राज्य किया। फिर लौकिक धर्मों और वैदिक नियमोंका विचार करके भगवान् केशवकी आराधनाका निश्चित व्रत ग्रहण किया। इसके बाद वे दक्षिणसमुद्रके पुरुषोत्तमक्षेत्रमें गये और जगन्नाथजीके पास ही सुन्दर रमणीय प्रदेशमें एक सुन्दर मन्दिर बनवाया और श्वेतशिलाके द्वारा भगवान् श्वेतमाधवकी प्रतिमा बनवाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा की। उस समय ब्राह्मणों, दीनों, अनाथों और तपस्वियोंको दान दे राजाने भगवान् माधवके समीप पृथ्वीपर गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर एक मासतक मौन एवं निराहार रहकर द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप किया। जप समाप्त होनेपर भगवान् देवेश्वरकी इस प्रकार स्तुति आरम्भ की।

श्वेत बोले— ॐ वासुदेवको नमस्कार है। सबको

* पुरुषोत्तमक्षेत्रमें भगवान् नृसिंह तथा श्वेतमाधवका माहात्म्य * १३१

अपनी ओर खींचनेवाले संकर्षणको नमस्कार है। अत्यंत द्युतिमान् प्रद्युम्न, कभी रुद्ध न होनेवाले अनिरुद्ध तथा नारायणको नमस्कार है। जिनके अनेक रूप हैं, जो विश्वरूप, विधाता, निर्गुण, अतर्क्य, शुद्ध एवं उज्ज्वल कर्मवाले हैं, उनको नमस्कार है। जिनकी नाभिमें कमल है, जो पद्मगर्भ ब्रह्माजीकी उत्पत्तिके कारण हैं, उनको नमस्कार है। जिनका वर्ण कमलके समान है, जो हाथमें भी कमल लिये रहते हैं, उनको नमस्कार है। जिनके नेत्र कमलके समान हैं, जो सहस्रों नेत्रोंसे युक्त और शिवस्वरूप हैं, उन्हें नमस्कार हैं। जिनके सहस्रों पैर और सहस्रों भुजाएँ हैं, उन मन्युरूप परमेश्वरको नमस्कार है। ॐ वराहरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। जो वर देनेवाले, उत्तम बुद्धिसे युक्त, वरिष्ठ, वरेण्य, शरणागतरक्षक और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है। ॐ बालरूपधारी, बाल-कमलके समान कान्तिमान्, बालसूर्य और चन्द्रमारूप नेत्रोंवाले, मनोहर केशोंसे सुशोभित, बुद्धिमान् भगवान् विष्णुको प्रणाम है। केशवको नमस्कार है, नारायणको नित्य नमस्कार है। सर्वश्रेष्ठ माधव एवं गोविन्दको नमस्कार है। ॐ विष्णुको नमस्कार है। हिरण्यरेता अग्निदेवको नित्य नमस्कार है। मधुसूदनको प्रणाम है। शुद्ध स्वरूप एवं किरणोंको धारण करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार है। अनन्तको नमस्कार है। सूक्ष्मस्वरूप एवं श्रीवत्सधारीको प्रणाम है। तीन बड़े-बड़े डगोंवाले तथा दिव्य पीताम्बर धारण करनेवाले वामनको नमस्कार है। भगवन्! आप सृष्टिकर्ता हैं। आपको नमस्कार है। आप ही सबके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। गुणस्वरूप एवं निर्गुणको नमस्कार है। वामनरूप भगवान्‌को नमस्कार है। वामनकर्मा श्रीहरिको प्रणाम है। वामननेत्र प्रभुको नमस्कार है और वामनवाहन माधवको प्रणाम है। रमणीय, पूज्य तथा अव्यक्तस्वरूप भगवान्‌को नमस्कार है। अतर्क्य, शुद्ध एवं भयहारी हरिको प्रणाम है। जो संसाररूपी समुद्रसे तारनेके लिये नौकाके समान हैं, जो परम शान्त एवं चैतन्यस्वरूप हैं, शिव, सौम्यरूप, रुद्र तथा उद्धारकर्ता हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। जो संसारका संहार करनेवाले और उसे भोग प्रदान करनेवाले हैं, समस्त विश्व जिनका स्वरूप है और जो समस्त विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। ॐ दिव्यस्वरूप सोम, अग्नि और वायुस्वरूप भगवान्‌को नमस्कार है। चन्द्रमा और सूर्यकी किरणें जिनके केश हैं, जो गौओं तथा ब्राह्मणोंका हित करनेवाले हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है। ॐ ऋक्स्वरूप पद और क्रमरूप भगवान्‌को प्रणाम है। ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी स्तुति होती है, ऋचाओंका जप जिनकी प्राप्तिका साधन है, उन भगवान्‌को नमस्कार है। ॐ यजुर्वेदको धारण करनेवाले और यजुर्वेदरूपधारी भगवान्‌को प्रणाम है। जिनका यजुर्वेदके मन्त्रोंसे यजन किया जाता है, जो सबसे सेवित और यजुर्वेदके मन्त्रोंके अधिपति हैं, उन परमात्माको नमस्कार है। ॐ देव श्रीपते! आपको नमस्कार है। सर्वश्रेष्ठ श्रीधरको प्रणाम है। जो लक्ष्मीके प्रियतम, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले, योगियोंके ध्येय और योगी हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है। ॐ सामस्वरूप परमात्माको नमस्कार है। जो श्रेष्ठ सामध्वनि हैं, साम (शान्तभाव)-के कारण जो सौम्य प्रतीत होते हैं तथा जो सामयोगके ज्ञाता हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है। जो साक्षात् सामवेद, सामगान और सामवेदको धारण करनेवाले हैं, जिन्हें सामवेदोक्त यज्ञोंका ज्ञान है, जो सामवेदको