वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०४ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३
आदि संस्कारोंका होना आवश्यक बताया गया है, इसलिये; च= तथा; तद्भावाभिलापात् = शूद्रके लिये उन संस्कारोंका अभाव कहा गया है; इसलिये भी (जाति-शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है)। व्याख्या—उपनिषदोंमें जहाँ-जहाँ वेदविद्याके अध्ययनका प्रसंग आया है वहाँ सब जगह यह देखा जाता है कि आचार्य पहले शिष्यका उपनयनादि संस्कार करके ही उसे वेदविद्याका उपदेश देते हैं। यथा— 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम्॥' (मु० उ० ३।२।१०) अर्थात् 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश दे, जिन्होंने विधिपूर्वक उपनयनादि संस्कार कराकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया हो।' 'उप त्वा नेष्ये' (छा० उ० ४।४।५) 'तेरा उपनयन- संस्कार करूँगा।' 'तं॒ँ होपनिन्ये।' (श० ब्रा० ११।५।३।१३) 'उसका उपनयन-संस्कार किया' इत्यादि। इस प्रकार वेदविद्याके अध्ययनमें उपनयन आदि संस्कारोंका होना परम आवश्यक माना गया है तथा शूद्रोंके लिये उन संस्कारोंका विधान नहीं किया है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रोंका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— तद्भावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १। ३। ३७॥ तद्भावनिर्धारणे=शिष्यमें उस शूद्रत्वका अभाव निश्चित करनेके लिये; प्रवृत्तेः=आचार्यकी प्रवृत्ति पायी जाती है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि वेदाध्ययनमें शूद्रका अधिकार नहीं है)। व्याख्या—जानश्रुति तथा रैक्वकी कथाके बाद ही सत्यकाम जाबालका प्रसंग इस प्रकार आया है—'जाबालके पुत्र सत्यकामने गौतम नामक आचार्यकी शरणमें जाकर कहा—'भगवन्! मैं ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक आपकी सेवामें रहनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।' तब गौतमने उसकी जातिका निश्चय करनेके लिये पूछा—'तेरा गोत्र क्या है?' इसपर उसने स्पष्ट शब्दोंमें कहा— 'मैं अपना गोत्र नहीं जानता। मैंने अपनी मातासे गोत्र पूछा था, उसने कहा कि