वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३८ ] अध्याय १ १०५ 'मुझे गोत्र नहीं मालूम है, मेरा.नाम जबाला है और तेरा नाम सत्यकाम है।' इसलिये मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि 'मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' तब गुरुने कहा- 'इतना स्पष्ट और सत्यभाषण ब्राह्मण ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।' इस प्रकार सत्यभाषणरूप हेतुसे यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं है, उसे आचार्य गौतमने समिधा लानेका आदेश दिया और उसका उपनयन-संस्कार कर दिया' (छा० उ० ४।४।३-५)। इस तरह इस प्रकरणमें आचार्यद्वारा पहले यह निश्चय कर लिया गया कि 'सत्यकाम शूद्र नहीं, ब्राह्मण है'। फिर उसका उपनयन- संस्कार करके उसे विद्याध्ययनका अधिकार प्रदान किया गया; इससे यही सिद्ध होता है कि शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध- अब प्रमाणद्वारा शूद्रके वेदविद्यामें अधिकारका निषेध करते हैं- श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॥ १। ३। ३८॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्=शूद्रके लिये वेदोंके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है, इससे; च=तथा; स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे भी (यही सिद्ध होता है कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है)। व्याख्या-श्रुतिमें शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है। यथा- एतच्छ्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रस्य समीपे नाध्येतव्यम्।' अर्थात् 'जो शूद्र है, वह श्मशानके तुल्य है, अतः शूद्रके समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये।' इसके द्वारा शूद्रके वेद-श्रवणका निषेध सूचित होता है। जब सुननेतकका निषेध है, तब अध्ययन और अर्थज्ञानका निषेध स्वतः सिद्ध हो जाता है। इससे तथा स्मृतिके वचनसे भी यही सिद्ध होता है कि 'शूद्रको वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है।' इस विषयमें पराशर-स्मृतिका वचन इस प्रकार है- 'वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात्।' (१।७३) अर्थात् 'वेदके अक्षरोंका अर्थ समझनेके लिये विचार करनेपर शूद्र तत्काल पतित हो जाता है।' मनुस्मृतिमें भी कहा है कि