वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ 'न शूद्राय मतिं दद्यात्। (४।८०) अर्थात् 'शूद्रको वेदविद्याका ज्ञान नहीं देना चाहिये।' इसी प्रकार अन्य स्मृतियोंमें भी जगह-जगह शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका निषेध किया गया है। इससे यही मानना चाहिये कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है। इतिहासमें जो विदुर आदि शूद्रजातीय सत्पुरुषोंको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात पायी जाती है, उसका भाव यों समझना चाहिये कि इतिहास-पुराणोंको सुनने और पढ़नेमें चारों वर्णोंका समान रूपसे अधिकार है। इतिहास-पुराणोंके द्वारा शूद्र भी परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उसे भी भक्ति एवं ज्ञानका फल प्राप्त हो सकता है। फलप्राप्तिमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि भगवान्की भक्तिद्वारा परम गति प्राप्त करनेमें मनुष्यमात्रका अधिकार है (गीता ९। ३२)। सम्बन्ध— यहाँतकके प्रकरणमें प्रसंगवश प्राप्त हुए अधिकारविषयक वर्णनको पूरा करके यह सिद्धान्त स्थिर किया कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका अधिकार है और शूद्रका अधिकार नहीं है। अब इस विषयको यहीं समाप्त करके पुनः पूर्वोक्त अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया जाता है— कम्पनात् ॥ १ । ३ । ३९ ॥ (पूर्वोक्त अंगुष्ठमात्र पुरुष परब्रह्म परमात्मा ही है;) कम्पनात्=क्योंकि उसीमें सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उसीके भयसे सब काँपते हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्के दूसरे अध्यायमें प्रथम वल्लीसे लेकर तृतीय वल्लीतक अंगुष्ठमात्र पुरुषका प्रकरण आया है (देखिये २।१।१२, १३ तथा २।३।१७ के मन्त्र)। यहाँ अंगुष्ठमात्र पुरुषके रूपमें वर्णित उस परम पुरुष परमात्माके प्रभावका वर्णन किया है तथा बादमें यह बात कही है कि— यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ (क० उ० २। ३। २) 'उस परमात्मासे निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह