भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

सूत्र ४० ] अध्याय १ १०७ उस प्राणस्वरूप ब्रह्ममें ही चेष्टा करता है, उस उठे हुए वज्रके समान महान् भयानक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।' तथा— भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (क० उ० २। ३। ३) 'इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र, वायु तथा पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब अपने-अपने कार्यमें दौड़ रहे हैं।' इस वर्णनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अंगुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् जिसमें चेष्टा करता है अथवा जिसके भयसे कम्पित होकर सब देवता अपने-अपने कार्यमें संलग्न रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है और न इन्द्र ही। वायु और इन्द्र स्वयं ही उसकी आज्ञाका पालन करनेके लिये भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अंगुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमें लेशमात्र भी संशयके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध— इस पादके चौदहवें सूत्रसे लेकर तेईसवेंतक दहराकाशका प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक है; फिर २४ वें सूत्रसे कठोपनिषद्में वर्णित अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार चल पड़ा; क्योंकि दहराकाशकी भाँति वह भी हृदयमें ही स्थित बताया गया है। उसी प्रकरणमें देवादिके वेदविद्यामें अधिकार-सम्बन्धी प्रासंगिक विषयपर विचार चल पड़ा और अड़तीसवें सूत्रमें वह प्रसंग समाप्त हुआ। फिर उनतालीसवें सूत्रमें पहलेके छोड़े हुए अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया गया। इस प्रकार बीचमें आये हुए प्रसंगान्तरोंपर विचार करके अब पुनः दहराकाशविषयक छूटे हुए प्रकरणपर विचार आरम्भ किया जाता है— ज्योतिर्दर्शनात् ॥ १। ३। ४० ॥ ज्योतिः = यहाँ 'ज्योति' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; दर्शनात् = क्योंकि श्रुतिमें (अनेक स्थलोंपर) ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है।