वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के अन्तर्गत दहराकाशविषयक प्रकरणमें यह कहा गया है कि 'य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।' (८।३।४) अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद (जीवात्मा) है, वह शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' इस वर्णनमें जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, क्योंकि श्रुतिमें अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है। उदाहरणके लिये यह श्रुति उद्धृत की जाती है- 'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते।' (छा० उ० ३।१३।७) अर्थात् 'इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति प्रकाशित हो रही है।' इसमें 'ज्योतिः' पद परमात्माके ही अर्थमें है; इसका निर्णय पहले किया जा चुका है। ऊपर दी हुई (८।३।४) श्रुतिमें 'ज्योतिः' पदका 'परम' विशेषण आया है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्मको ही वहाँ 'परम ज्योति' कहा गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त सूत्रमें 'दहर' के प्रकरणमें आये हुए 'ज्योतिः' पदको परब्रह्मका वाचक बताकर उस प्रसंगको वहीं समाप्त कर दिया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि 'दहराकाश' के प्रकरणमें आया हुआ 'आकाश' शब्द परब्रह्मका वाचक हो, परंतु छान्दोग्य० (८।१४।१) - में जो 'आकाश' शब्द आया है, वह किस अर्थमें है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्र प्रारम्भ करते हैं- आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ४१ ॥ आकाशः=(वहाँ) 'आकाश' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; अर्थान्तर- त्वादिव्यपदेशात्=क्योंकि उसे नाम-रूपमय जगत्से भिन्न वस्तु बताया गया है। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (८।१४।१)-में कहा गया है कि 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृत ँस आत्मा।' अर्थात् 'आकाश नामसे प्रसिद्ध तत्त्व नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है, वे दोनों जिसके भीतर हैं, वह ब्रह्म है, वह अमृत है और वही आत्मा है।' इस प्रसंगमें 'आकाश' को नाम-रूपसे भिन्न तथा नाम-