भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

( ८ ) (८) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है (४। ४। १)। वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है (४। ४। २)। (९) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी (४। ४। ८ तथा ४। ४। १२)। (१०) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें जाकर सायुज्यमुक्ति लाभ कर लेते हैं (४। ४। ४) और कोई चैतन्यमात्र स्वरूपसे अलग भी रह सकते हैं (४। ४। ७)। (११) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलयकालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं (४। ३।१०)। (१२) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है (४। २। १९-२०)। (१३) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धमें औपचारिक है (२। ३। ३३ से ४० तक)। (१४) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है (२। ३। ४१)। (१५) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही है, वास्तवमें नहीं है (२। ३। २९)। (१६) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता (३। ३। ३०, ४२; ३। ३। ५२; ३। ४। ५२) (४। २। १२–१६)। (१७) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान कर सकता है (४। १। १६-१७)। (१८) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है। सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है (३। ४। ४९)। (१९) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता (४। ४।२२)।