भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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( ९ ) (२०) ज्ञानीके पूर्वकृत संचित पुण्य-पापका नाश हो जाता है। नये कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता (४।१।१३-१४)। प्रारब्धकर्मका उपभोगद्वारा नाश हो जानेपर वर्तमान शरीर नष्ट हो जाता है और वह ब्रह्मलोकको या वहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है (४।१।१९)। (२१) ब्रह्मविद्याके साधकको यज्ञादि आश्रमकर्म भी निष्कामभावसे करने चाहिये (३।४।२६)। शम-दम आदि साधन अवश्य कर्तव्य हैं (३।४।२७)। (२२) ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है (३।४।२ से २५ तक)। (२३) परमात्माकी प्राप्तिका हेतु ब्रह्मज्ञान ही है (३।३।४७ तथा ३।४।१)। (२४) यह जगत् प्रलयकालमें भी अप्रकटरूपसे वर्तमान रहता है (२।१।१६)। इन सबको ध्यानमें रखकर इस ग्रन्थका अनुशीलन करना चाहिये। इससे परमात्माका क्या स्वरूप है, उनकी प्राप्तिके कौन-से साधन हैं और साधकका परमात्माके साथ क्या सम्बन्ध है—इन बातोंकी तथा साधनोपयोगी अन्य आवश्यक विषयोंकी जानकारी प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचनेमें विशेष सहायता प्राप्त हो सकती है। अतः प्रत्येक साधकको श्रद्धापूर्वक इस ग्रन्थका अध्ययन एवं मनन करना चाहिये। श्रीरामनवमी ⎫ विनीत, संवत् २००९ वि० ⎭ हरिकृष्णदास गोयन्दका