वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ और 'परमज्योति' नामसे परमात्माका भेदपूर्वक निरूपण है। इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्तिकालमें भी जीवात्मा और परमात्माका भेदपूर्वक वर्णन होनेसे उपर्युक्त 'आकाश' शब्द मुक्तात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि मुक्तात्मामें ब्रह्मके सदृश कुछ सद्गुणोंका आविर्भाव होनेपर भी उसमें नाम-रूपात्मक जगत्को धारण करनेकी शक्ति नहीं आती। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १ । ३ । ४३ ॥ पत्यादिशब्देभ्यः = उस परब्रह्मके लिये श्रुतिमें पति, परमपति, परममहेश्वर आदि विशेष शब्दोंका प्रयोग होनेसे भी (यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।७)-में परमात्माके स्वरूपका इस प्रकार वर्णन आया है— तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥ 'ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तवन करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हमलोग सबसे परे जानते हैं।' इस मन्त्रमें देवता आदिकी कोटिमें जीवात्मा हैं और परम देवता, परम महेश्वर एवं परम पतिके नामसे परमात्माका वर्णन किया गया है। इससे भी यही निश्चय होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है। इसलिये 'आकाश' शब्द परमात्माका ही वाचक है, मुक्त जीवका नहीं। तीसरा पाद सम्पूर्ण