भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 486 में से

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चौथा पाद सम्बन्ध — पहलेके तीन पादोंमें ब्रह्मको जगत्के जन्म आदिका कारण बताकर वेदवाक्योंद्वारा वह बात प्रमाणित की गयी। श्रुतियोंमें जहाँ- जहाँ संदेह होता था, उन स्थलोंपर विचार करके उस संदेहका निवारण किया गया। आकाश, आनन्दमय, ज्योति, प्राण आदि जो शब्द या नाम ब्रह्मपरक नहीं प्रतीत होते थे; जीवात्मा या जडप्रकृतिके बोधक जान पड़ते थे, उन सबको परब्रह्म परमात्माका वाचक सिद्ध किया गया। प्रसंगवश आयी हुई दूसरी-दूसरी बातोंका भी निर्णय किया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें कहीं प्रकृतिका वर्णन है या नहीं? यदि है तो उसका स्वरूप क्या माना गया है? इत्यादि। इन्हीं सब ज्ञातव्य विषयोंपर विचार करनेके लिये चतुर्थ पाद आरम्भ किया जाता है। कठोपनिषद्में 'अव्यक्त' नाम आया है; वहाँ 'अव्यक्तम्' पद प्रकृतिका वाचक है या अन्य किसीका? इस शंकाका निवारण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च॥ १। ४। १॥ चेत्=यदि कहो; आनुमानिकम् = अनुमानकल्पित जडप्रकृति; अपि = भी; एकेषाम्=एक शाखावालोंके मतमें वेदप्रतिपादित है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः = क्योंकि शरीर ही यहाँ रथके रूपकमें पड़कर 'अव्यक्त' शब्दसे गृहीत होता है; दर्शयति च=यही बात श्रुति दिखाती भी है। व्याख्या—यदि कहो कि कठोपनिषद् (१।३।११)-में जो 'अव्यक्तम्' पद आया है, वह अनुमानकल्पित या सांख्यप्रतिपादित प्रकृतिका वाचक है, तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और विषय आदिकी जो रथ, रथी एवं सारथि आदिके रूपमें कल्पना की गयी है, उस कल्पनामें रथके स्थानपर शरीरको रखा गया है। उसीका नाम यहाँ

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