वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २३ ] अध्याय १ १३१ जीवात्माका परमात्मामें विलीन होना बताया है, वह परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है। सम्बन्ध—‘‘वेदमें ‘शक्ति’ (श्वेता० ६।८), ‘अजा’ (श्वेता० १।९ तथा ४।५), ‘माया’ (श्वेता० ४।१०) तथा ‘प्रधान’ (श्वेता० १।१०) आदि नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, उसीको ईश्वरकी अध्यक्षतामें जगत्का कारण बताया गया है। गीता आदि स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन है (गीता ९।१०)। इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि जगत्का निमित्त कारण अर्थात् अधिष्ठाता, नियामक, संचालक तथा रचयिता तो अवश्य ही ईश्वर है; परंतु उपादान कारण ‘प्रकृति’ तथा ‘माया’ नामसे कहा हुआ ‘प्रधान’ ही है।‘’ ऐसा मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्॥ १।४।२३॥ प्रकृतिः=उपादान कारण; च=भी (ब्रह्म ही है); प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्= क्योंकि ऐसा माननेसे ही श्रुतिमें आये हुए प्रतिज्ञा-वाक्य तथा दृष्टान्त- वाक्य बाधित नहीं होंगे। व्याख्या—श्वेतकेतुके उपाख्यानमें उसके पिताने श्वेतकेतुसे पूछा है कि ‘उत तमादेशमप्राक्ष्यः॥ येनाश्रुतँ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्।’ (छा० उ० ६।१।२-३) अर्थात् ‘क्या तुमने अपने गुरुसे उस तत्त्वके उपदेशके लिये भी जिज्ञासा की है, जिसके जाननेसे बिना सुना हुआ सुना हुआ हो जाता है, बिना मनन किया हुआ मनन किया हुआ हो जाता है तथा बिना जाना हुआ जाना हुआ हो जाता है?’ यह सुनकर श्वेतकेतुने अपने पितासे पूछा—‘भगवन्! वह उपदेश कैसा है?’ तब उसके पिताने दृष्टान्त देकर समझाया—‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्यात्।’ (छा० उ० ६।१।४) अर्थात् ‘जिस प्रकार एक मिट्टीके ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीकी बनी सब वस्तु जानी हुई हो जाती है कि ‘यह सब मिट्टी है।’ इसके बाद आरुणिने इसी प्रकार सोने और लोहेका भी दृष्टान्त दिया है। यहाँ पहले जो पिताने प्रश्न किया है, वह तो प्रतिज्ञा-वाक्य है और