वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ मिट्टी आदिके उदाहरणसे जो समझाया गया है, वह दृष्टान्त-वाक्य है। यदि ब्रह्मसे भिन्न 'प्रधान' को यहाँ उपादान कारण मान लिया जाय तो उसके एक अंशको जाननेपर प्रधानका ही ज्ञान होगा, ब्रह्मका ज्ञान नहीं होगा। परंतु वहाँ ब्रह्मका ज्ञान कराना अभीष्ट है, अतः प्रतिज्ञा और दृष्टान्तकी सार्थकता भी जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको माननेसे ही हो सकती है। मुण्डकोपनिषद् (१।१।२ तथा १।१।७)-में भी इसी प्रकार प्रतिज्ञा-वाक्य और दृष्टान्त- वाक्य मिलते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् (४।५।६, ८)-में भी प्रतिज्ञा तथा दृष्टान्तपूर्वक उपदेश मिलता है। उन सब स्थलोंमें भी उनकी सार्थकता पूर्ववत् ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे ही हो सकती है; यह समझ लेना चाहिये। श्वेताश्वतरोपनिषद् आदिमें अजा, माया, शक्ति और प्रधान आदि नामोंसे जिसका वर्णन है, वह कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है। वह तो भगवान्के अधीन रहनेवाली उन्हींकी शक्तिविशेषका वर्णन है। यह बात वहाँके प्रकरणको देखनेसे स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आगे-पीछेके वर्णनपर विचार करनेसे भी यही सिद्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद्में यह स्पष्ट कहा गया है कि 'उस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी दिव्य शक्तियाँ स्वाभाविक सुनी जाती हैं, (६।८)१ तथा उस परमेश्वरका उससे भिन्न कोई कार्यकारण (शरीर-इन्द्रिय आदि) नहीं है।' (६।८)२ इससे भी यही सिद्ध होता है कि उस परमेश्वरकी शक्ति उससे भिन्न नहीं है। अग्निके उष्णत्व और प्रकाशकी भाँति उसका वह स्वभाव ही है। इसीलिये परमात्माको बिना मन और इन्द्रियोंके उन सबका कार्य करनेमें समर्थ कहा गया है (श्वेता० ३।१९)३ भगवद्गीतामें भी भगवान्ने जड प्रकृतिको सांख्योंकी भाँति जगत्का उपादान १-यह मन्त्र पृष्ठ २४ की टिप्पणीमें आया है। २-'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते।' ३-अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ 'वह परमात्मा हाथ-पैरसे रहित होकर भी समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला तथा