वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४] अध्याय १ १३३ कारण नहीं बताया है; किंतु अपनी अध्यक्षतामें अपनी ही स्वरूपभूता प्रकृतिको चराचर जगत्की उत्पत्ति करनेवाली कहा है (गीता ९।१०)। जड प्रकृति जड और चेतन दोनोंका उपादान कारण किसी प्रकार भी नहीं हो सकती। अतः इस वर्णनमें प्रकृतिको भगवान्की स्वरूपभूता शक्ति ही समझना चाहिये। इसके सिवा, भगवान्ने सातवें अध्यायमें परा और अपरा नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन करके (७।४-५) अपनेको समस्त जड-चेतनात्मक जगत्का प्रभव और प्रलय बताते हुए (७।६) सबका महाकारण बताया है (७।७)। अतः श्रुतियों और स्मृतियोंके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये फिर कहते हैं— अभिध्योपदेशाच्च ॥ १।४।२४॥ अभिध्योपदेशात् = अभिध्या—चिन्तन अर्थात् संकल्पपूर्वक सृष्टि- रचनाका श्रुतिमें वर्णन होनेसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि जगत्का उपादान कारण ब्रह्म ही है)। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ सृष्टिरचनाका प्रकरण है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ‘सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेय' (तै० उ० २।६) अर्थात् ‘उसने संकल्प किया कि मैं एक ही बहुत हो जाऊँ, अनेक रूपोंमें प्रकट होऊँ।' तथा ‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' (छा०उ० ६।२।३) ‘उसने ईक्षण—संकल्प किया कि मैं बहुत होऊँ, अनेक रूपोंमें प्रकट हो जाऊँ।' इस प्रकार अपनेको ही विविध रूपोंमें प्रकट करनेका संकल्प लेकर सृष्टिकर्ता परमात्माके सृष्टिरचनामें प्रवृत्त होनेका वर्णन श्रुतियोंमें उपलब्ध होता है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर स्वयं ही जगत्का उपादान कारण है। इसके सिवा, श्रुतिमें यह भी कहा गया है कि वेगपूर्वक गमन करनेवाला है। आँखोंके बिना ही सब कुछ देखता है, बिना कानोंके ही सब कुछ सुनता है; जाननेमें आनेवाली सब वस्तुओंको जानता है, परंतु उसको जाननेवाला कोई नहीं है। ज्ञानीजन उसे महान् आदि पुरुष कहते हैं।'