वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।' (छा० उ० ३।१४।१) अर्थात् 'निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है; क्योंकि उससे उत्पन्न होता, उसीमें स्थित रहता तथा अन्तमें उसीमें लीन होता है, इस प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना (चिन्तन) करे।' इससे भी उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि होती है। सम्बन्ध—उक्त मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं— साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ १।४।२५॥ साक्षात्=श्रुति साक्षात् अपने वचनोंद्वारा; च=भी; उभयाम्नानात्=ब्रह्मके उभय (उपादान और निमित्त) कारण होनेकी बात दोहराती है, इससे भी (ब्रह्म ही उपादान कारण सिद्ध होता है, प्रकृति नहीं)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद्में इस प्रकार वर्णन आता है—'एक समय कुछ महर्षि यह विचार करनेके लिये एकत्र हुए कि जगत्का कारण कौन है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? किससे जी रहे हैं? हमारी स्थिति कहाँ है? हमारा अधिष्ठाता कौन है? कौन हमें नियमपूर्वक सुख-दुःखमें नियुक्त करता है? उन्होंने सोचा, कोई कालको, कोई स्वभावको, कोई कर्मको, कोई होनहारको, कोई पाँचों महाभूतोंको, कोई उनके समुदायको कारण मानते हैं। इनमें ठीक-ठीक कारण कौन है? यह निश्चय करना चाहिये। फिर उनके मनमें यह विचार उठा कि इनमेंसे एक या इनका समुदाय जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि ये चेतनके अधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं हैं तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता; क्योंकि वह सुख-दुःखका भोक्ता और पराधीन है। * फिर उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर अपने गुणोंसे छिपी
- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या। संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः॥ (श्वेता० १। १-२)