भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 486 में से

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पृष्ठ 138

सूत्र २६-२७ ] अध्याय १ १३५ हुई उस परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता शक्तिका 'कारणरूपमें' दर्शन किया; जो परमेश्वर अकेला ही पूर्वोक्त कालसे लेकर आत्मातक समस्त कारणोंपर शासन करता है।'* उपर्युक्त वर्णनमें स्पष्ट ही उस परमात्माको सबका उपादान कारण और संचालक (निमित्त कारण) बताया है। इसके सिवा इसी उपनिषद्के २।१६ में तथा दूसरे-दूसरे उपनिषदोंमें भी जगह-जगह उस परमात्माको सर्वरूप कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है। सम्बन्ध—अब उक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा प्रमाण देते हैं— आत्मकृतेः॥ १।४। २६॥ आत्मकृतेः = स्वयं अपनेको जगत्-रूपमें प्रकट करनेका वर्णन होनेसे (ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद् (२।७)-में कहा है कि 'प्रकट होनेसे पहले यह जगत् अव्यक्तरूपमें था, उससे ही यह प्रकट हुआ है, उस परब्रह्म परमेश्वरने स्वयं अपनेको ही इस जगत्के रूपमें प्रकट किया।' इस प्रकार कर्ता और कर्मके रूपमें उस एक ही परमात्माका वर्णन होनेसे स्पष्ट ही श्रुतिका यह कथन हो जाता है कि ब्रह्म ही इसका निमित्त और उपादान कारण है। सम्बन्ध—यहाँ यह शंका होती है कि परमात्मा तो पहलेसे ही नित्य कर्त्तारूपमें स्थित है, वह कर्म कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— परिणामात् ॥ १ । ४ । २७॥ परिणामात् = श्रुतिमें उसके जगत्-रूपमें परिणत होनेका वर्णन होनेसे (यही मानना चाहिये कि वह ब्रह्म ही इस जगत्का कर्ता है और वह स्वयं ही इस रूपमें बना है)।

  • यह मन्त्र पृष्ठ ११४ में और सूत्र १।४।८ की व्याख्यामें आ गया है।