वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद् (२।६)—में कहा है कि ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत्। तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्। यदिदं किञ्च। तत्सत्यमित्याचक्षते।’ अर्थात् ‘उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर वह परमात्मा स्वयं उसमें जीवके साथ-साथ प्रविष्ट हो गया। उसमें प्रविष्ट होकर वह स्वयं ही सत् (मूर्त) और त्यत् (अमूर्त) भी हो गया। बतानेमें आनेवाले और न आनेवाले, आश्रय देनेवाले और न देनेवाले तथा चेतन और जड, सत्य और मिथ्या—इन सबके रूपमें सत्यस्वरूप परमात्मा ही हो गया। जो कुछ भी यह दीखता और अनुभवमें आता है, वह सत्य ही है, इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं।’ इस प्रकार श्रुतिने परब्रह्म परमात्माके ही सब रूपोंमें परिणत होनेका प्रतिपादन किया है; इसलिये वही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है। परिणामका अर्थ यहाँ विकार नहीं है। जैसे सूर्य अपनी अनन्त किरणोंका सब ओर प्रसार करते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर अपनी अनन्त अचिन्त्य ऐश्वर्यशक्तियोंका निक्षेप करते हैं; उनके इस शक्तिनिक्षेपसे ही विचित्र जगत्का प्रादुर्भाव स्वतः होने लगता है। अतः यही समझना चाहिये कि निर्विकार एकरस परमात्मा अपने स्वरूपसे अच्युत एवं अविकृत रहते हुए ही अपनी अचिन्त्य शक्तियोंद्वारा जगत्के रूपमें प्रकट हो जाते हैं; अतः उनका कर्ता और कर्म होना—उपादान एवं निमित्त कारण होना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध—इसीके समर्थनमें सूत्रकार दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— योनिश्च हि गीयते॥ १। ४। २८॥ हि=क्योंकि; योनिः=(वेदान्तमें ब्रह्मको) योनि; च=भी; गीयते=कहा जाता है (इसलिये ब्रह्म ही उपादान कारण है)। व्याख्या—‘योनि’ का अर्थ उपादान कारण होता है। उपनिषदोंमें अनेक स्थलोंपर परब्रह्म परमात्माको ‘योनि’ कहा गया है; जैसे—‘कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ (मु० उ० ३। १। ३) अर्थात् ‘जो सबके कर्ता, सबके शासक तथा ब्रह्माजीकी भी योनि (उपादान कारण) परम पुरुषको देखता है।’ ‘भूतयोनिं