भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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( ११ ) सूत्र विषय पृष्ठ १८ अधिदैव आदिमें ‘अन्तर्यामीरूप’ से ब्रह्मकी स्थिति......... ६२ १९-२० जडप्रकृति और जीवात्माकी अन्तर्यामिताका निराकरण....... ६३-६४ २१-२२ श्रुतिमें जिसे अदृश्यत्व आदि धर्मोंसे युक्त बताया है, वह ब्रह्म है, प्रकृति या जीवात्मा नहीं; इसका प्रतिपादन........ ६४-६६ २३ विराट्‌रूपके वर्णनसे ब्रह्मकारणवादका समर्थन............ ६६-६७ २४-२८ श्रुतिमें ‘वैश्वानर’ नाम ब्रह्मके लिये ही आया है, इसका युक्तियुक्त विवेचन................................................... ६७-७२ २९-३२ सर्वव्यापी परमात्माको देशविशेषसे सम्बद्ध बतानेका रहस्य.................................................................... ७२-७५ तीसरा पाद १-७ द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार ब्रह्म ही है, जीवात्मा अथवा प्रकृति नहीं, इसका प्रतिपादन........................... ७६-८० ८-९ ब्रह्म ही भूमा है—इसका उपपादन.............................. ८०-८३ १०-१२ श्रुतिमें ब्रह्मको ‘अक्षर’ कहा गया है इसका युक्तियुक्त समर्थन... ८३-८५ १३ ‘ॐ’ इस अक्षरके द्वारा ध्येय तत्त्व भी ब्रह्म ही है, इसका निरूपण........................................................ ८५-८६ १४-२३ दहराकाशकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन.......................... ८६-९३ २४-२५ अंगुष्ठमात्र पुरुषकी परब्रह्मरूपता और उसे हृदयमें स्थित बतानेका रहस्य........................................................ ९३-९४ २६-३० ब्रह्मविद्यामें मनुष्योंके सिवा देवताओंके भी अधिकारका प्रतिपादन और इसमें सम्भावित विरोधका परिहार......... ९४-९९ ३१-३३ यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओंके अधिकारका जैमिनिद्वारा विरोध और बादरायणद्वारा उसका परिहार...... ९९-१०१ ३४-३८ वेदविद्यामें शूद्रके अनधिकारका कथन......................... १०१-१०६ ३९ अंगुष्ठमात्र पुरुषके ब्रह्मरूप होनेमें दूसरी युक्ति............ १०६-१०७ ४०-४३ ‘ज्योति’ तथा ‘आकाश’ भी ब्रह्मके ही वाचक हैं, इसका समर्थन........................................................ १०७-११०