वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४-५ ] अध्याय २ १४१ न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ २ । १ । ४ ॥ न=चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है; अस्य विलक्षणत्वात्=क्योंकि यह कार्यरूप जगत् उस (कारण)-से विलक्षण (जड) है; च=और; तथात्वम्= उसका जड होना; शब्दात्=शब्द (वेद) प्रमाणसे सिद्ध है। व्याख्या— श्रुतिमें परब्रह्म परमात्माको ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ (तै० उ० २। १) इस प्रकार सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त आदि लक्षणोंवाला बताया गया है और जगत्को ज्ञानरहित विचारणीय (तै० उ० १। ७) अर्थात् जड कहा गया है। अतः श्रुति-प्रमाणसे ही इसकी परमेश्वरसे विलक्षणता सिद्ध होती है। कारणसे कार्यका विलक्षण होना युक्तिसंगत नहीं है; इसलिये चेतन परब्रह्म परमात्माको अचेतन जगत्का उपादान कारण नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध— यदि कहो, अचेतन कहे जानेवाले आकाश आदि तत्त्वोंका भी श्रुतिमें चेतनकी भाँति वर्णन मिलता है। जैसे—‘तत्तेज ऐक्षत’ (छा० उ० ६। २। ३) ‘उस तेजने विचार किया।’ ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छा० उ० ६। २। ४) ‘उस जलने विचार किया’ इत्यादि। तथा पुराणोंमें नदी, समुद्र, पर्वत आदिका भी चेतन-जैसा वर्णन किया गया है। इस प्रकार चेतन होनेके कारण यह जगत् चेतन परमात्मासे विलक्षण नहीं है, इसलिये चेतन परमात्माको इसका कारण माननेमें कोई आपत्ति नहीं है तो इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है— अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ २ । १ । ५ ॥ तु=किंतु; (वहाँ तो) अभिमानिव्यपदेशः=उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन है; (यह बात) विशेषानुगतिभ्याम्=विशेष शब्दोंके प्रयोगसे तथा उन तत्त्वोंमें देवताओंके प्रवेशका वर्णन होनेसे (सिद्ध होती है)। व्याख्या— श्रुतिमें जो ‘तेज, जल आदिने विचार किया’ इत्यादि रूपसे जड तत्त्वोंमें चेतनके व्यवहारका कथन है, वह तो उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंको लक्ष्य करके है। यह बात उन-उन स्थलोंमें प्रयुक्त हुए विशेष शब्दोंसे सिद्ध होती है। जैसे तेज, जल और अन्न—इन तीनोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद इन्हें ‘देवता’ कहा गया है (छा० उ० ६। ३। २)। तथा