भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 486 में से

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पृष्ठ 145

१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४)-में 'अग्नि वाणी बनकर मुखमें प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिकामें प्रविष्ट हुआ।' इस प्रकार उनकी अनुगतिका उल्लेख होनेसे भी उनके अभिमानी देवताओंका ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिये ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण बताना युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि आकाश आदि जड तत्त्व भी इस जगत्में उपलब्ध होते हैं; जो कि चेतन ब्रह्मके धर्मोंसे सर्वथा विपरीत लक्षणोंवाले हैं। सम्बन्ध—ऊपर उठायी हुई शंकाका ग्रन्थकार उत्तर देते हैं— दृश्यते तु॥ २। १। ६॥ तु=किंतु; दृश्यते=श्रुतिमें उपादानसे विलक्षण वस्तुकी उत्पत्तिका वर्णन भी देखा जाता है (अतः ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण मानना अनुचित नहीं है)। व्याख्या—यह कहना ठीक नहीं है कि उपादानसे उत्पन्न होनेवाला कार्य उससे विलक्षण नहीं हो सकता; क्योंकि मनुष्य आदि चेतन व्यक्तियोंसे नख-लोम आदि जड वस्तुओंकी उत्पत्तिका वर्णन वेदमें देखा जाता है। जैसे—'यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्॥' (मु० उ० १।१।७) अर्थात् 'जैसे जीवित मनुष्यसे केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्मसे यह सब जगत् उत्पन्न होता है।' सजीव चेतन पुरुषसे जड नख-लोम आदिकी उत्पत्ति उससे सर्वथा विलक्षण ही तो है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत तथा श्रुति- स्मृतियोंसे अनुमोदित है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी विषयमें दूसरी शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात्॥ २। १। ७॥ चेत्=यदि कहो; (ऐसा माननेसे) असत्=असत्कार्यवाद अर्थात् जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित होगा; इति न=तो ऐसी