वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८ ] अध्याय २ १४३ बात नहीं है; प्रतिषेधमात्रत्वात् = क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेधमात्रका अर्थात् सर्वथा अभावका बोधक है। व्याख्या - यदि कहो 'अवयवरहित चेतन ब्रह्मसे सावयव जड वर्गकी उत्पत्ति माननेपर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति माननेका दोष उपस्थित होगा, जो कि श्रुति-प्रमाणके विरुद्ध है, क्योंकि वेदमें असत्से सत्की उत्पत्तिको असम्भव बताया गया है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ वेदमें कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्तिका निषेध नहीं है; अपितु 'असत्' शब्दवाच्य अभावसे भावकी उत्पत्तिको असम्भव कहा गया है। वेदान्त-शास्त्रमें अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है; किंतु सत्स्वरूप सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें जो जड-चेतनात्मक जगत् शक्तिरूपसे विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता है, उसीका उसके संकल्पसे प्रकट होना उत्पत्ति है। इसलिये परब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति मानना असत्से सत्की उत्पत्ति मानना नहीं है। सम्बन्ध - इसपर पुनः पूर्वपक्षिकी ओरसे शंका उपस्थित की जाती है— अपीतौ तद्वत्प्रसंगादसमंजसम् ॥ २ । १ । ८ ॥ अपीतौ = (ऐसा माननेपर) प्रलयकालमें; तद्वत्प्रसंगात् = ब्रह्मको उस संसारके जडत्व और सुख-दुःखादि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसंग उपस्थित होगा, इसलिये; असमंजसम् = उपर्युक्त मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या - यदि प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्का उस परब्रह्म परमात्मामें विद्यमान रहना माना जायगा, तब तो उस ब्रह्मको जड प्रकृतिके जडत्व तथा जीवोंके सुख-दुःख आदि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसंग आ जायगा, जो किसीको मान्य नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उस परब्रह्म परमेश्वरको सदैव जडत्व आदि धर्मोंसे रहित, निर्विकार और सर्वथा विशुद्ध बताया गया है। इसलिये उपर्युक्त मान्यता युक्तियुक्त नहीं है। सम्बन्ध - अब सूत्रकार उपर्युक्त शंकाका निराकरण करते हैं—