वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ न तु दृष्टान्तभावात् ॥ २ । १ । ९ ॥ (उपर्युक्त वेदसम्मत सिद्धान्तमें) तु=निःसंदेह; न=पूर्वसूत्रमें बताये हुए दोष नहीं हैं; दृष्टान्तभावात्=क्योंकि ऐसे बहुत-से दृष्टान्त उपलब्ध होते हैं (जिनसे कारणमें कार्यके विलीन हो जानेपर भी उसमें कार्यके धर्म नहीं रहनेकी बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—पूर्वसूत्रमें की हुई शंका समीचीन नहीं है; क्योंकि कार्यके अपने कारणमें विलीन हो जानेके बाद उसके धर्म कारणमें रहते हैं, ऐसा नियम नहीं है; अपितु इसके विपरीत बहुत-से दृष्टान्त मिलते हैं। अर्थात् जब कार्य कारणमें विलीन होता है, तब उसके धर्म भी कारणमें विलीन हो जाते हैं, ऐसा देखा जाता है। जैसे सुवर्णसे बने हुए आभूषण जब अपने कारणमें विलीन हो जाते हैं, तब उन आभूषणोंके धर्म सुवर्णमें नहीं देखे जाते हैं तथा मिट्टीसे बने हुए घट आदि पात्र जब अपने कारण मृत्तिकामें विलीन हो जाते हैं, तब घट आदिके धर्म उस मृत्तिकामें नहीं देखे जाते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत-से दृष्टान्त हैं। इससे यही सिद्ध हुआ कि प्रलयकाल या सृष्टिकालमें और किसी भी अवस्थामें कारण अपने कार्यके धर्मोंसे लिप्त नहीं होता है। सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रमें वादीकी शंकाका निराकरण किया गया। अब उसके द्वारा उठाये हुए दोषोंकी उसीके मतमें व्याप्ति बताकर अपने मतको निर्दोष सिद्ध करते हैं— स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ । १ । १०॥ स्वपक्षदोषात्=वादीके अपने पक्षमें उपर्युक्त सभी दोष आते हैं इसलिये; च=भी (प्रधानको जगत्का कारण मानना ठीक नहीं है)। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी स्वयं यह मानते हैं कि जगत्का कारणरूप प्रधान अवयवरहित, अव्यक्त और अग्राह्य है। उससे साकार, व्यक्त तथा देखने-सुननेमें आनेवाले जगत्की उत्पत्ति मानना तो कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्ति माननेका दोष स्वीकार करना है तथा जगत्की उत्पत्तिके पहले