वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ११ ] अध्याय २ १४५ कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमें नहीं रहते और कार्यकी उत्पत्तिके पश्चात् कार्यमें आ जाते हैं, यह माननेके कारण उनके मतमें असत्से सत्की उत्पत्ति स्वीकार करनेका दोष भी ज्यों-का-त्यों रहा। इसके सिवा, प्रलयकालमें जब समस्त कार्य प्रधानमें विलीन हो जाते हैं, उस समय कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमें नहीं रहते; ऐसी मान्यता होनेके कारण वादीके मतमें भी कारणमें कार्यके धर्म आ जानेकी शंका पूर्ववत् बनी रहती है। इसलिये वादीके द्वारा उपस्थित किये हुए तीनों दोष उसके प्रधानकारणवादमें ही पाये जाते हैं, अतः प्रधानको जगत्का कारण मानना कदापि उचित नहीं है। सम्बन्ध — उपर्युक्त कथनपर वादीद्वारा किये जा सकनेवाले आक्षेपका स्वयं उपस्थित करके सूत्रकार उसका निराकरण करते हैं— तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनि- र्मोक्षप्रसंगः ॥ २ । १ । ११ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; तर्काप्रतिष्ठानात्=तर्कोंकी स्थिरता न होनेपर; अपि=भी; अन्यथानुमेयम्=दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणका निश्चय करना चाहिये; एवम् अपि=तो ऐसी स्थितिमें भी; अनिर्मोक्षप्रसंगः=मोक्ष न होनेका प्रसंग आ जायगा। व्याख्या—एक मतावलम्बीद्वारा उपस्थित की हुई युक्तिको दूसरा नहीं मानता, वह उसमें दोष सिद्ध करके दूसरी युक्ति उपस्थित करता है; किंतु इस दूसरी युक्तिको वह पहला नहीं मानता, वह उसमें भी दोष सिद्ध करके नयी ही युक्ति प्रस्तुत करता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे तर्क उठते रहनेसे उनकी कोई स्थिरता या समाप्ति नहीं है, यह कहना ठीक है तथापि दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणतत्त्वका निश्चय करना चाहिये, ऐसा कोई कहे तो ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थितिमें वेदप्रमाणरहित कोई भी अनुमान वास्तविक ज्ञान करानेवाला सिद्ध नहीं होगा। अतएव उसके द्वारा तत्त्वज्ञान