वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १४] अध्याय २ १४७ असम्भव हो जायगा, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि लोकमें एक कारणसे उत्पन्न हुई वस्तुओंमें ऐसा विभाग प्रत्यक्ष देखा जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म और जीवात्मा तथा जीव और जडवर्गका विभाग होनेमें भी कोई बाधा नहीं रहेगा। अर्थात् लोकमें जैसे यह बात देखी जाती है कि पिताका अंशभूत बालक जब गर्भमें रहता है तो गर्भजनित पीड़ाका भोक्ता वही होता है, पिता नहीं होता तथा उस बालक और पिताका विभाग भी प्रत्यक्ष देखा जाता है। उसी प्रकार ब्रह्ममें भोक्तापन आनेकी आशंका नहीं है तथा जीवात्मा और परमात्माके परस्पर विभाग होनेमें भी कोई अड़चन नहीं है। इसके सिवा, जैसे एक ही पितासे उत्पन्न बहुत-से लड़के परस्पर एक-दूसरेके सुख-दुःखके भोक्ता नहीं होते, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न जीवोंको कर्मानुसार जो सुख-दुःख प्राप्त होते हैं, उनका उपभोग वे पृथक्-पृथक् ही करते हैं, एक-दूसरेके नहीं। इसी तरह यह भी देखा जाता है कि एक ही पृथिवी-तत्त्वके नाना प्रकारके कार्य घट, पट, कपाट आदिमें परस्पर भेदकी उपलब्धि अनायास हो रही है, उसमें कोई बाधा नहीं आती। घड़ा वस्त्र या कपाट नहीं बनता और वस्त्र घड़ा नहीं बनता और कपाट वस्त्र नहीं बनता। सबके अलग-अलग नाम, रूप और व्यवहार चलते रहते हैं। उसी प्रकार एक ही ब्रह्मके असंख्य कार्य होनेपर भी उनके विभागमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती है। सम्बन्ध — ऐसा माननेसे कारण और कार्यमें अनन्यता सिद्ध नहीं होगी, ऐसी शंका प्राप्त होनेपर कहते हैं— तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ २। १। १४॥ आरम्भणशब्दादिभ्यः = आरम्भण शब्द आदि हेतुओंसे; तदनन्यत्वम् = उसकी अर्थात् कार्यकी कारणसे अनन्यता सिद्ध होती है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥' (छा० उ० ६।१।४) अर्थात् 'हे सोम्य ! जैसे मिट्टीके