वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ एक ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीसे उत्पन्न होनेवाले समस्त कार्य जाने हुए हो जाते हैं, उनके नाम और आकृतिके भेद तो व्यवहारके लिये हैं, वाणीसे उनका कथनमात्र होता है, वास्तवमें तो कार्यरूपमें भी वह मिट्टी ही है।' इसी प्रकार यह कार्यरूपमें वर्तमान जगत् भी ब्रह्मरूप ही है। इस कथनसे जगत्की ब्रह्मसे अनन्यता सिद्ध होती है; तथा सूत्रमें 'आदि' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अभिप्राय निकलता है कि इस प्रकरणमें आये हुए दूसरे वाक्योंसे भी यही बात सिद्ध होती है। उक्त प्रकरणमें 'ऐतदात्म्यमिदँ सर्वम्' का (छा० उ० ६।८ से लेकर १६ वें खण्डतक) प्रयोग कई बार हुआ है। इसका अर्थ है कि 'यह सब कुछ ब्रह्मस्वरूप है।' इस प्रकार श्रुतिने कारणरूप ब्रह्मसे कार्यरूप जगत्की अनन्यताका स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादन किया है। उसी प्रकरणमें उपदेशका आरम्भ करके आचार्यने कहा है— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।' (छा० उ० ६।२।१) अर्थात् 'हे सौम्य ! यह समस्त जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र अद्वितीय सत्यस्वरूप ब्रह्म ही था।' इससे अनन्यताके साथ-साथ यह भी सिद्ध होता है कि यह जड़-चेतन भोग्य और भोक्ताके आकारमें प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् उत्पत्तिके पहले भी अवश्य था। परंतु था परब्रह्म परमात्माकी शक्तिरूपमें। इसका वर्तमान रूप उस समय अप्रकट था। जैसे स्वर्णके विकार हार-कंकण- कुण्डल आदि उत्पत्तिके पहले और विलीन होनेके बाद अपने कारणरूप स्वर्णमें शक्तिरूपसे रहते हैं। शक्ति, शक्तिमान्में अभेद होनेके कारण उनकी अनन्यतामें किसी प्रकारका दोष नहीं आता, उसी प्रकार यह जड़- चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् उत्पत्तिके पहले और प्रलयके बाद परब्रह्म परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अव्यक्त रहता है। अतः जगत्की ब्रह्मसे अनन्यतामें किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती। गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है कि 'यह आठ भेदोंवाली जड़-प्रकृति तो मेरी अपरा प्रकृतिरूपा शक्ति है और जीवरूप चेतनसमुदाय मेरी परा प्रकृति है' (७।५)। इसके बाद यह भी बताया है कि 'ये दोनों समस्त प्राणियोंके कारण हैं और मैं सम्पूर्ण